अक्सर लोगों के बीच यह धारणा सुनने को मिलती है कि किसी व्यक्ति का "खून गाढ़ा हो गया है।" चिकित्सा विज्ञान में यह स्थिति पूरी तरह काल्पनिक नहीं है। इसे हाइपरकोएगुलेबिलिटी अथवा हाइपरविस्कॉसिटी सिंड्रोम कहा जाता है, जिसमें रक्त सामान्य से अधिक चिपचिपा या गाढ़ा हो सकता है। इस अवस्था में रक्त का प्रवाह धीमा पड़ने लगता है और नसों अथवा धमनियों में रक्त के थक्के बनने का खतरा बढ़ जाता है। कई बार शरीर में पानी की कमी के कारण रक्त का तरल भाग कम हो जाता है, जबकि कुछ मामलों में लाल रक्त कोशिकाओं या विशेष प्रोटीन की मात्रा बढ़ने से भी रक्त अधिक गाढ़ा हो जाता है। चिकित्सकों के अनुसार यह स्थिति केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है, बल्कि बदलती जीवनशैली के कारण युवाओं में भी तेजी से देखने को मिल रही है।
किन कारणों से बढ़ता है रक्त का गाढ़ापन?
रक्त के गाढ़े होने के पीछे अनेक कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। शरीर में पर्याप्त पानी न पीने से निर्जलीकरण की स्थिति बनती है, जिससे रक्त का तरल भाग कम हो जाता है और उसका घनत्व बढ़ सकता है। कुछ लोगों में अस्थि मज्जा आवश्यकता से अधिक लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण करने लगती है, जिसे चिकित्सकीय भाषा में एरिथ्रोसाइटोसिस कहा जाता है। इसके अतिरिक्त धूम्रपान, मोटापा, लंबे समय तक बैठे रहना, शारीरिक गतिविधियों का अभाव, मधुमेह, कुछ हार्मोनल दवाओं का सेवन, गर्भावस्था, बड़ी शल्य चिकित्सा, गंभीर चोट तथा कुछ आनुवंशिक विकार भी रक्त के थक्के बनने की संभावना बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि कई बार कैंसर, ऑटोइम्यून रोग और कुछ दुर्लभ रक्त विकार भी इस समस्या के पीछे प्रमुख कारण बनते हैं।
किन लोगों में सबसे अधिक रहता है खतरा?
रक्त के गाढ़े होने का जोखिम प्रत्येक व्यक्ति में समान नहीं होता। जिन लोगों का वजन अधिक है, जो नियमित रूप से धूम्रपान करते हैं या घंटों तक एक ही स्थान पर बैठे रहते हैं, उनमें यह जोखिम अधिक देखा जाता है। लंबी हवाई यात्राएं, कार्यालय में लगातार बैठकर काम करना तथा पर्याप्त व्यायाम न करना भी रक्त के प्रवाह को प्रभावित कर सकता है। गर्भवती महिलाओं, प्रसव के बाद की अवस्था में रहने वाली महिलाओं, हार्मोन थेरेपी लेने वालों तथा गर्भनिरोधक गोलियों का लंबे समय तक उपयोग करने वाली महिलाओं में भी रक्त के थक्के बनने की संभावना अपेक्षाकृत अधिक रहती है। परिवार में पहले से ब्लड क्लॉट, स्ट्रोक या आनुवंशिक रक्त विकार का इतिहास होने पर भी अतिरिक्त सतर्कता की आवश्यकता होती है।
किन संकेतों को बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?
रक्त के गाढ़े होने के शुरुआती लक्षण कई बार सामान्य थकान या कमजोरी जैसे प्रतीत होते हैं, इसलिए लोग इन्हें गंभीरता से नहीं लेते। लगातार सिरदर्द, चक्कर आना, अत्यधिक थकान, हाथ-पैरों में झुनझुनी, पैरों में दर्द या सूजन, सांस लेने में कठिनाई तथा सीने में दर्द जैसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। यदि रक्त का थक्का मस्तिष्क तक पहुंच जाए तो स्ट्रोक, हृदय की धमनियों में पहुंचने पर हार्ट अटैक तथा फेफड़ों में पहुंचने पर पल्मोनरी एम्बोलिज्म जैसी जानलेवा स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए विशेषज्ञ किसी भी संदिग्ध लक्षण को नजरअंदाज न करने की सलाह देते हैं।
कैसे होती है जांच और क्या है उपचार की दिशा?
रक्त के गाढ़ेपन की पुष्टि केवल लक्षणों के आधार पर नहीं की जा सकती। चिकित्सक रोगी के स्वास्थ्य इतिहास, शारीरिक परीक्षण तथा विभिन्न रक्त जांचों के आधार पर स्थिति का आकलन करते हैं। आवश्यकता पड़ने पर रक्त कोशिकाओं की संख्या, रक्त के थक्के बनने की क्षमता, विशेष प्रोटीन तथा आनुवंशिक कारणों की जांच भी कराई जाती है। यदि ब्लड क्लॉट बनने का जोखिम अधिक पाया जाता है तो चिकित्सक स्थिति के अनुसार रक्त को पतला रखने वाली दवाएं, जीवनशैली में बदलाव तथा मूल बीमारी का उपचार सुझाते हैं। स्वयं से किसी भी प्रकार की रक्त पतला करने वाली दवा लेना खतरनाक हो सकता है, इसलिए उपचार हमेशा विशेषज्ञ की निगरानी में ही होना चाहिए।
जीवनशैली में छोटे बदलाव बन सकते हैं बड़ी सुरक्षा
स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर रक्त के गाढ़े होने के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीना, नियमित व्यायाम करना, लंबे समय तक लगातार बैठे रहने से बचना, धूम्रपान और तंबाकू का सेवन छोड़ना तथा संतुलित आहार लेना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। जिन लोगों को पहले ब्लड क्लॉट की समस्या हो चुकी है या जिनमें जोखिम अधिक है, उन्हें नियमित स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए और चिकित्सक द्वारा दी गई दवाओं तथा सलाह का पूरी तरह पालन करना चाहिए। समय पर पहचान और उचित उपचार से इस समस्या से होने वाली गंभीर जटिलताओं से काफी हद तक बचाव संभव है।