भारत में अंग प्रत्यारोपण की व्यवस्था पिछले कुछ दशकों में तेजी से विस्तृत हुई है, लेकिन इसके भीतर मौजूद लैंगिक असमानता अब गंभीर सामाजिक विमर्श का विषय बन रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 1995 से 2021 के बीच भारत में जीवित अंगदान करने वालों में लगभग पांच में चार महिलाएं थीं, जबकि अंग प्राप्त करने वालों में लगभग पांच में चार पुरुष रहे। यह अनुपात केवल चिकित्सा व्यवस्था की तस्वीर नहीं दिखाता, बल्कि भारतीय परिवारों में महिलाओं और पुरुषों की पारंपरिक भूमिकाओं के बीच मौजूद अंतर को भी सामने लाता है। मां, पत्नी, बहन या अन्य महिला रिश्तेदार अक्सर अपने परिवार के किसी पुरुष सदस्य की जान बचाने के लिए अपने स्वास्थ्य और शरीर को जोखिम में डालने का निर्णय लेती दिखाई देती हैं।
इस असंतुलन को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि अंगदान किसी सामान्य चिकित्सा प्रक्रिया की तरह नहीं है। जीवित व्यक्ति द्वारा अंगदान में विस्तृत चिकित्सकीय जांच, शल्य प्रक्रिया, अस्पताल में भर्ती और उसके बाद लंबी स्वास्थ्य-लाभ अवधि शामिल होती है। इसके बावजूद जब परिवार के किसी करीबी सदस्य की जान बचाने का सवाल सामने आता है तो महिलाओं के सामने सामाजिक और भावनात्मक अपेक्षाएं भी सक्रिय हो जाती हैं। यही वजह है कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि महिलाएं अंगदान के लिए स्वेच्छा से अधिक तैयार रहती हैं। इसके पीछे परिवार के भीतर उनकी भूमिका, निर्णय लेने की स्वतंत्रता और सामाजिक दबाव जैसे प्रश्नों को भी गंभीरता से समझना होगा।
मां और पत्नी की भूमिका बन रही है सबसे बड़ा कारण
भारतीय परिवार व्यवस्था में महिलाओं को लंबे समय से देखभाल करने वाली भूमिका से जोड़ा जाता रहा है। बच्चे की बीमारी हो, पति की गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो या परिवार के किसी सदस्य को लंबे समय तक उपचार की जरूरत हो, देखभाल की प्राथमिक जिम्मेदारी अक्सर महिलाओं के हिस्से आती है। यही भावनात्मक जिम्मेदारी कई बार अंगदान के निर्णय तक पहुंच जाती है। जब पति या बेटे को गंभीर बीमारी के कारण प्रत्यारोपण की जरूरत होती है, तब मां या पत्नी अपने अंग का एक हिस्सा देकर उसकी जिंदगी बचाने को परिवार के प्रति अपने कर्तव्य के रूप में देखने लगती है।
इस स्थिति का दूसरा पहलू यह है कि परिवारों में महिलाओं से त्याग की अपेक्षा भी अधिक की जाती है। भारतीय सामाजिक संरचना में महिला द्वारा परिवार के लिए त्याग को अक्सर नैतिक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि पुरुषों के लिए आर्थिक जिम्मेदारी को प्राथमिक भूमिका माना जाता है। परिणामस्वरूप जब अंगदान का सवाल सामने आता है तो महिला के लिए अपने शरीर और स्वास्थ्य को परिवार के किसी सदस्य के लिए समर्पित करना सामाजिक रूप से अधिक स्वीकार्य दिखाई दे सकता है। हालांकि हर अंगदान को दबाव का परिणाम मानना भी उचित नहीं होगा, लेकिन यह जरूर जरूरी है कि चिकित्सा व्यवस्था यह सुनिश्चित करे कि महिला दाता का निर्णय पूरी तरह स्वतंत्र, सूचित और दबावमुक्त हो।
प्रत्यारोपण की बढ़ती संख्या के बीच जीवित दाताओं पर निर्भरता
भारत में अंग प्रत्यारोपण की संख्या पिछले वर्षों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। वर्ष 2013 में जहां देश में प्रत्यारोपण की संख्या पांच हजार से भी कम थी, वहीं 2025 में यह आंकड़ा करीब 20,019 तक पहुंच गया। यह वृद्धि देश में प्रत्यारोपण सुविधाओं, चिकित्सा तकनीक और विशेषज्ञता के विस्तार को दर्शाती है। इसके साथ ही अंगदान के प्रति जागरूकता और संस्थागत ढांचे में सुधार की भी भूमिका रही है। लेकिन प्रत्यारोपण की बढ़ती जरूरत के मुकाबले मृत दाताओं से मिलने वाले अंगों की उपलब्धता अभी भी सीमित है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कुल अंग प्रत्यारोपण में मृत दाताओं से प्राप्त अंगों की हिस्सेदारी लगभग 18 प्रतिशत के आसपास है, जबकि बड़ी संख्या में प्रत्यारोपण के लिए जीवित दाताओं पर निर्भरता बनी हुई है। खासकर यकृत और गुर्दे जैसे अंगों के प्रत्यारोपण में परिवार के सदस्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसका सीधा प्रभाव परिवार के भीतर उन सदस्यों पर पड़ता है जो दाता बनने की स्थिति में होते हैं। जब मृत दाता व्यवस्था पर्याप्त मजबूत नहीं होती, तब किसी परिवार के भीतर ही यह तय करना पड़ता है कि कौन व्यक्ति अपना अंग देकर मरीज की जिंदगी बचाएगा। यही वह बिंदु है जहां लैंगिक असमानता और सामाजिक अपेक्षाएं एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं।
पुरुष कम अंगदान क्यों करते हैं, इसके पीछे स्वास्थ्य भी बड़ी वजह
महिलाओं की अधिक संख्या को केवल सामाजिक त्याग की प्रवृत्ति से जोड़ना अधूरा विश्लेषण होगा। संभावित दाताओं की चिकित्सकीय उपयुक्तता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अंगदान से पहले व्यक्ति की विस्तृत स्वास्थ्य जांच की जाती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दान करने के बाद उसके स्वास्थ्य पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। इस प्रक्रिया में उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, धूम्रपान, अत्यधिक शराब सेवन और चयापचय संबंधी समस्याओं जैसी स्थितियां महत्वपूर्ण हो सकती हैं। कई अध्ययनों में पुरुषों में इन जोखिम कारकों की अधिक मौजूदगी देखी गई है, जिसके कारण कुछ पुरुष संभावित दाता के रूप में चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त नहीं पाए जा सकते हैं।
यहां यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि महिलाएं जैविक रूप से अंगदान के लिए अनिवार्य रूप से बेहतर दाता नहीं होतीं। दाता की उपयुक्तता उम्र, स्वास्थ्य, अंग की स्थिति, रक्त समूह, प्रत्यारोपण की आवश्यकता और दाता-प्राप्तकर्ता के चिकित्सकीय मिलान जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है। कुछ परिस्थितियों में महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान विकसित प्रतिरक्षात्मक संवेदनशीलता भी प्रत्यारोपण के मिलान को प्रभावित कर सकती है। इसलिए दाता और प्राप्तकर्ता के बीच लैंगिक अनुपात को केवल पुरुष या महिला होने के आधार पर समझना उचित नहीं है। इसके पीछे चिकित्सा और सामाजिक दोनों स्तरों पर कई परतें मौजूद हैं।
कमाने वाले पुरुष और देखभाल करने वाली महिलाओं का आर्थिक अंतर
अंगदान का निर्णय केवल भावनात्मक या चिकित्सकीय नहीं होता, उसका आर्थिक असर भी परिवार पर पड़ सकता है। जीवित दाता को शल्य प्रक्रिया के बाद कुछ समय तक आराम और नियमित चिकित्सकीय निगरानी की आवश्यकता होती है। यकृत दान के मामले में दाता को सामान्यतः कई दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ सकता है और पूर्ण स्वास्थ्य लाभ में कई सप्ताह लग सकते हैं। कामकाजी व्यक्ति के लिए यह अवधि आय में कमी या रोजगार से अस्थायी दूरी का कारण बन सकती है। ऐसे परिवारों में जहां पुरुष मुख्य कमाने वाला सदस्य होता है, वहां उसके लंबे समय तक काम से दूर रहने का आर्थिक जोखिम परिवार को अंगदान के निर्णय से पीछे हटा सकता है।
इसके विपरीत महिलाओं का बड़ी संख्या में घरेलू और अवैतनिक देखभाल कार्यों में होना एक अलग तरह की समस्या पैदा करता है। किसी महिला के अंगदान के बाद उसकी अपनी स्वास्थ्य-लाभ अवधि के दौरान घर और परिवार की जिम्मेदारियां कौन संभालेगा, यह सवाल कई बार पर्याप्त गंभीरता से नहीं पूछा जाता। यदि महिला पहले से ही परिवार की देखभाल का बड़ा हिस्सा संभालती है तो अंगदान के बाद उसकी शारीरिक रिकवरी और मानसिक स्वास्थ्य पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसलिए अंगदान में लैंगिक समानता का अर्थ केवल पुरुषों को अधिक दाता बनाने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि महिला दाताओं की सुरक्षा, सम्मान, स्वतंत्र निर्णय और उपचार के बाद पर्याप्त सहयोग सुनिश्चित करना भी होना चाहिए।
अंगदान की व्यवस्था को महिला दाताओं के लिए और सुरक्षित बनाना जरूरी
जीवित अंगदान किसी व्यक्ति का महान मानवीय निर्णय हो सकता है, लेकिन चिकित्सा व्यवस्था में दाता की सुरक्षा हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इसका अर्थ है कि किसी महिला को केवल इसलिए अंगदान के लिए प्रेरित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह परिवार में मां, पत्नी या बेटी की भूमिका निभाती है। दाता को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अवसर, संभावित जोखिमों की स्पष्ट जानकारी और जरूरत पड़ने पर परिवार के दबाव से अलग गोपनीय चिकित्सकीय परामर्श मिलना आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जीवित अंगदान के संदर्भ में दाता की स्वायत्तता और सूचित सहमति को अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत माना जाता है।
इसके साथ ही भारत में मृत अंगदान को बढ़ावा देना भी इस असंतुलन को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। यदि अस्पतालों में संभावित मृत दाताओं की पहचान, परिवारों से संवेदनशील संवाद, अंग संरक्षण और समय पर प्रत्यारोपण की व्यवस्थाएं अधिक प्रभावी बनती हैं तो जीवित पारिवारिक दाताओं पर दबाव कम किया जा सकता है। इससे विशेष रूप से उन महिलाओं को राहत मिल सकती है जो सामाजिक या पारिवारिक अपेक्षाओं के कारण अपनी इच्छा से अधिक त्याग करने की स्थिति में पहुंच जाती हैं। अंगदान की पूरी व्यवस्था का लक्ष्य मरीज की जान बचाने के साथ-साथ दाता के जीवन और अधिकारों की रक्षा करना भी होना चाहिए।
महिलाओं का त्याग सवाल भी है और बदलाव का अवसर भी
भारत में अंगदान के आंकड़ों में महिलाओं की बड़ी हिस्सेदारी एक तरफ उनके परिवार के प्रति गहरे भावनात्मक जुड़ाव और मानवीय संवेदना को दिखाती है, लेकिन दूसरी तरफ यह सवाल भी उठाती है कि क्या परिवार की जिम्मेदारियां और त्याग का बोझ अभी भी लैंगिक रूप से असमान तरीके से बंटा हुआ है। यदि दशकों तक महिलाएं मुख्य रूप से अंग देती रहें और पुरुष मुख्य रूप से अंग प्राप्त करते रहें तो इसे केवल व्यक्तिगत निर्णयों का संयोग मानकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। इसके पीछे सामाजिक संरचना, आर्थिक भूमिका, स्वास्थ्य संबंधी अंतर और परिवार के भीतर निर्णय लेने की शक्ति जैसे पहलुओं का अध्ययन आवश्यक है।
अंगदान को वास्तव में मानवीय और समानतापूर्ण व्यवस्था बनाने के लिए समाज को त्याग की परंपरा के साथ अधिकार और सुरक्षा की भाषा भी जोड़नी होगी। किसी मां द्वारा बेटे के लिए या पत्नी द्वारा पति के लिए अंगदान निस्संदेह जीवन बचाने वाला असाधारण निर्णय हो सकता है, लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि उस महिला का निर्णय स्वतंत्र हो, उसके स्वास्थ्य की पूरी सुरक्षा हो और उसके त्याग को सामाजिक कर्तव्य मानकर उस पर कोई दबाव न डाला जाए। आने वाले समय में भारत की प्रत्यारोपण व्यवस्था की सफलता केवल प्रत्यारोपणों की बढ़ती संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से भी मापी जानी चाहिए कि इसमें दाता और प्राप्तकर्ता दोनों के साथ समानता, गरिमा और न्याय कितना सुनिश्चित किया जा रहा है।