भारत और रूस के बीच दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी अब परिवहन और संपर्क के नए आयाम की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। रूस ने भारत तथा हिंद महासागर तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए संभावित भूमि आधारित रेल कॉरिडोर विकसित करने की संभावना पर विचार व्यक्त किया है। रूसी उपप्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन के अनुसार वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों और बोस्फोरस जलडमरूमध्य तथा होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिमों को देखते हुए वैकल्पिक स्थलीय संपर्क भविष्य की आवश्यकता बन सकता है।
हालांकि अभी तक न तो किसी सीधी यात्री ट्रेन की आधिकारिक घोषणा हुई है और न ही इस परियोजना को अंतिम मंजूरी मिली है। फिलहाल यह विचार प्रारंभिक चर्चा और रणनीतिक योजना के स्तर पर ही मौजूद है।
किन देशों से होकर गुजर सकता है संभावित रेल मार्ग
प्रस्तावित संपर्क मार्ग के लिए मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के कई देशों को संभावित विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। प्रारंभिक चर्चाओं में तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान के रास्ते भारत तक पहुंच बनाने की संभावना सामने आई है। हालांकि अंतिम मार्ग का निर्धारण अभी नहीं हुआ है और विभिन्न भौगोलिक, राजनीतिक तथा सुरक्षा पहलुओं का विस्तृत अध्ययन किया जाना बाकी है।
यदि भविष्य में यह रेल कॉरिडोर विकसित होता है तो यह केवल दो देशों को जोड़ने वाला मार्ग नहीं होगा, बल्कि एशिया के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों को एक साझा परिवहन नेटवर्क से जोड़ने वाला अंतरराष्ट्रीय गलियारा बन सकता है।
7,000 किलोमीटर की दूरी कितने समय में पूरी हो सकती है
यदि भविष्य में लगभग 7,000 किलोमीटर लंबा रेल मार्ग तैयार होता है तो केवल गणितीय दृष्टि से यात्रा का समय काफी आकर्षक दिखाई देता है। यदि ट्रेन औसतन 130 किलोमीटर प्रति घंटा की गति से लगातार चले तो यह दूरी लगभग 54 घंटे में पूरी की जा सकती है। 150 किलोमीटर प्रति घंटा की औसत गति पर यात्रा लगभग 47 घंटे और 160 किलोमीटर प्रति घंटा की गति पर लगभग 44 घंटे में पूरी होने का अनुमान लगाया जा सकता है।
लेकिन वास्तविक अंतरराष्ट्रीय रेल संचालन केवल गति पर निर्भर नहीं करता। विभिन्न देशों की सीमाओं पर आव्रजन जांच, सीमा शुल्क औपचारिकताएं, सुरक्षा परीक्षण, तकनीकी निरीक्षण, रेलवे गेज में संभावित अंतर, स्टेशन ठहराव और अलग-अलग देशों के परिचालन नियम यात्रा अवधि को काफी बढ़ा सकते हैं। इसलिए व्यावहारिक रूप से ऐसी यात्रा तीन से पांच दिन या उससे अधिक समय ले सकती है।
माल परिवहन हो सकता है परियोजना का मुख्य उद्देश्य
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य यात्री परिवहन नहीं बल्कि माल ढुलाई के लिए एक विश्वसनीय वैकल्पिक मार्ग विकसित करना हो सकता है। यदि रूस को भारत और हिंद महासागर तक स्थलीय संपर्क उपलब्ध हो जाता है तो समुद्री मार्गों पर निर्भरता कम होगी और व्यापारिक आपूर्ति श्रृंखला अधिक सुरक्षित तथा लचीली बन सकेगी।
यह परियोजना अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे जैसी पहलों को भी मजबूती दे सकती है और एशिया में व्यापारिक संपर्क को नया आयाम प्रदान कर सकती है। इससे ऊर्जा, औद्योगिक उत्पाद, मशीनरी तथा अन्य वस्तुओं के परिवहन में भी सुविधा मिलने की संभावना है।
भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने बढ़ाई वैकल्पिक मार्गों की जरूरत
हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंताएं सामने आती रही हैं। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा आपूर्ति का अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है। किसी भी प्रकार का क्षेत्रीय तनाव वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है।
ऐसे परिदृश्य में रूस के लिए भारत तक भूमि आधारित संपर्क विकसित करना केवल परिवहन परियोजना नहीं बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक निवेश के रूप में भी देखा जा रहा है। इससे व्यापारिक जोखिम कम करने, आपूर्ति श्रृंखला को विविध बनाने और क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने में सहायता मिल सकती है।
फिलहाल केवल चर्चा, आधिकारिक घोषणा का इंतजार
यद्यपि इस प्रस्ताव ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा शुरू कर दी है, लेकिन अभी परियोजना से जुड़ी कोई औपचारिक समयसीमा, वित्तीय योजना, निर्माण प्रक्रिया या परिचालन मॉडल घोषित नहीं किया गया है। अंतिम मार्ग, सहभागी देशों की सहमति, सुरक्षा व्यवस्था और आधारभूत ढांचे से जुड़े अनेक मुद्दों पर विस्तृत विचार-विमर्श होना बाकी है।
यदि भविष्य में यह रेल कॉरिडोर वास्तविकता का रूप लेता है तो यह एशिया की सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संपर्क परियोजनाओं में शामिल हो सकता है और भारत-रूस संबंधों के साथ-साथ क्षेत्रीय व्यापार और रणनीतिक सहयोग को भी नई दिशा दे सकता है।