भोपाल डेस्क: भोजन को अब केवल पेट भरने की चीज मानकर नहीं देखा जा सकता। सोचने, याद रखने, निर्णय लेने और भावनाओं को समझने की जटिल प्रक्रिया में शरीर और मस्तिष्क के बीच निरंतर संवाद चलता रहता है। भोजन में मौजूद पोषक तत्व शरीर की उन प्रक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं जिनका संबंध हमारे समग्र स्वास्थ्य और मानसिक सलामती से है। साइकोलॉजी नाउ पत्रिका के हालिया अंक में हैपी फूड और व्हाट इज ब्रेन फॉग शीर्षक से दो लेख प्रकाशित हुए हैं। ये लेख बताते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य केवल मन का मामला नहीं है बल्कि इसमें भोजन और शरीर की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। रसोई और दिमाग के बीच सीधा रिश्ता है और जवाब हां में है।
ब्रेन फॉग क्या है और कैसे महसूस होता है
जब व्यक्ति को ध्यान केंद्रित करने में परेशानी हो, चीजें याद करने में कठिनाई महसूस हो, स्पष्टता न रहे या लगातार थकान महसूस हो तो वह कह सकता है कि मेरा दिमाग आजकल ठीक से काम नहीं कर रहा। साइकोलॉजी नाउ में छपे लेख व्हाट इज ब्रेन फॉग में दिमागी धुंध का सबसे परेशान करने वाला पहलू यह है कि ऐसा व्यक्ति बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखता है। वह अपना काम कर रहा होता है, घर संभाल रहा होता है लेकिन भीतर उसे लगता है कि उसकी मानसिक गति कुंद पड़ गई है। मोबाइल खोलता है लेकिन भूल जाता है कि आखिर उसने मोबाइल खोला क्यों है। किसी परिचित का नाम याद करने में देर लगती है। बातचीत के बीच अचानक शब्द खो जाते हैं।
सुबह की थकान और दोपहर का तनाव
सुबह उठे लेकिन शरीर के साथ दिमाग जैसे पूरी तरह से जगा ही नहीं। सामने रखी चीज का नाम याद नहीं आ रहा। काम करने बैठते हैं पर ध्यान भटक जाता है। फिर दोपहर होते-होते थकान, चिड़चिड़ापन और तनाव बढ़ता है तथा मन कुछ मीठा, कुछ कुरकुरा व स्वादिष्ट खाने को तरसने लगता है। यह आज के दौर में ज्यादातर लोगों की समस्या है। हममें से बहुत से लोग इसे कभी थकान, कभी तनाव, कभी उम्र और कभी खराब याददाश्त का नाम देकर आगे बढ़ जाते हैं। क्या हमारे मन, मस्तिष्क और भोजन के बीच भी कोई ऐसा रिश्ता है जिसे हम लंबे समय से नजरअंदाज करते आए हैं? जवाब है कि हां, यह रिश्ता गहरा है।
खुश रहने का रास्ता भोजन में छिपा है
हैपी फूड लेख बताता है कि मानसिक स्वास्थ्य केवल मन का मामला नहीं है। इसमें भोजन और शरीर की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। भोजन में मौजूद पोषक तत्व उन प्रक्रियाओं को प्रभावित करते हैं जो मूड, एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन से जुड़ी होती हैं। सही भोजन चुनकर हम मस्तिष्क को बेहतर ईंधन दे सकते हैं। जब मन उदास हो या तनाव बढ़े तो केवल सोचने के तरीके पर ध्यान देना काफी नहीं। यह भी देखना जरूरी है कि हम क्या खा रहे हैं, कितनी नींद ले रहे हैं और शरीर के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं। रसोई से शुरू होने वाला बदलाव मानसिक स्पष्टता ला सकता है।
शरीर के साथ व्यवहार और दीर्घकालिक असर
दिमागी धुंध और मानसिक थकान अक्सर अनियमित खानपान, अपर्याप्त नींद और शरीर की उपेक्षा से जुड़ी होती है। जब हम शरीर की जरूरतों को नजरअंदाज करते हैं तो मस्तिष्क भी प्रभावित होता है। नियमित और संतुलित भोजन, पर्याप्त आराम और सचेत जीवनशैली इस समस्या को कम करने में मददगार साबित हो सकती है। साइकोलॉजी नाउ के लेखों से निकलकर आता है कि भोजन और मस्तिष्क का रिश्ता एकतरफा नहीं बल्कि द्विपक्षीय है। जो हम खाते हैं वह हमारे सोचने और महसूस करने के तरीके को प्रभावित करता है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल रसोई से शुरू होनी चाहिए।