ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में मध्यप्रदेश के सागर जिले की बेटी यामिनी मौर्य ने शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत की झोली में सिल्वर मेडल डाला है। महिला 57 किलोग्राम जूडो वर्ग में यामिनी ने रजत पदक जीतकर न केवल अपने राज्य बल्कि पूरे देश का नाम रोशन किया। उनके इस प्रदर्शन के साथ भारत के कुल पदकों की संख्या भी बढ़कर 20 हो गई। यामिनी की इस उपलब्धि के बाद मध्यप्रदेश में खुशी की लहर है। खेल प्रेमी, स्थानीय लोग और उनका परिवार इस ऐतिहासिक सफलता का जश्न मना रहा है।
समर कैंप से शुरू हुआ सफर, आज बनीं कॉमनवेल्थ मेडलिस्ट
यामिनी मौर्य का सफर किसी प्रेरणादायक कहानी से कम नहीं है। सागर जिले के एक साधारण किसान परिवार में जन्मी यामिनी बचपन से ही खेलों में रुचि रखती थीं। उनके पिता हरिओम मौर्य खेती-किसानी करते हैं और सीमित संसाधनों के बीच परिवार का पालन-पोषण करते रहे। साल 2012 में आयोजित एक समर कैंप में यामिनी पहली बार जूडो से जुड़ीं। यहीं से उन्होंने इस खेल की शुरुआती बारीकियां सीखीं और आगे बढ़ने का सपना देखा।
कोच ने पहचानी प्रतिभा, परिवार को किया तैयार
यामिनी के कोच दीपक रजक बताते हैं कि उन्होंने पहली बार यामिनी को पुराने सदर स्कूल के मैदान में खेलते देखा था। उनकी फुर्ती, संतुलन और खेल के प्रति लगन देखकर उन्हें लगा कि यह खिलाड़ी आगे चलकर बड़ा मुकाम हासिल कर सकती है। हालांकि शुरुआती दौर में आर्थिक परिस्थितियों और पारिवारिक संकोच के कारण उन्हें नियमित प्रशिक्षण दिलाना आसान नहीं था। लेकिन कोच के लगातार प्रयासों और समझाइश के बाद परिवार ने यामिनी को खेल परिसर भेजने का निर्णय लिया। यही फैसला उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ।
गंभीर चोट के बाद भी नहीं टूटा आत्मविश्वास
साल 2017 में एक प्रतियोगिता के दौरान यामिनी को गंभीर चोट लगी और उनका पैर फ्रैक्चर हो गया। इस वजह से उन्हें लगभग एक वर्ष तक प्रतियोगिताओं और अभ्यास से दूर रहना पड़ा। कई खिलाड़ियों के लिए ऐसी चोट करियर पर असर डालती है, लेकिन यामिनी ने हार नहीं मानी। पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद उन्होंने फिर से अभ्यास शुरू किया और लगातार मेहनत करते हुए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। आज उसी संघर्ष का परिणाम कॉमनवेल्थ गेम्स का सिल्वर मेडल है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले भी कर चुकी हैं कमाल
कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले भी यामिनी मौर्य कई बड़ी प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।
उनकी प्रमुख उपलब्धियां-
राष्ट्रीय खेल 2022 में गोल्ड मेडल
हांगकांग एशियन ओपन 2025 में गोल्ड मेडल
डकार अफ्रीका ओपन 2026 में गोल्ड मेडल
दो बार सीनियर नेशनल चैंपियन
वर्ष 2022 से लगातार भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व
कोच के अनुसार यामिनी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने वर्षों तक अपने 57 किलोग्राम वजन वर्ग को बनाए रखा, जो किसी भी जूडो खिलाड़ी के लिए बड़ी चुनौती माना जाता है।
परिवार की मेहनत और भरोसे का मिला इनाम
यामिनी के चाचा श्रीनाथ मौर्य ने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। शुरुआत में बाहर प्रतियोगिताओं में भेजना आसान नहीं था, लेकिन परिवार ने बेटी की प्रतिभा को समझा और हर कदम पर उसका साथ दिया। आज यामिनी की सफलता पूरे परिवार के लिए गर्व का विषय है। तीन बहनों और एक भाई के बीच पली-बढ़ी यामिनी ने यह साबित कर दिया कि अगर अवसर और समर्थन मिले तो बेटियां भी देश का नाम विश्व स्तर पर रोशन कर सकती हैं।
कोच बोले- ओलंपिक में भी करेंगी कमाल
यामिनी के कोच दीपक रजक का मानना है कि यह सफलता केवल शुरुआत है। उनका कहना है कि यदि यामिनी इसी तरह मेहनत और अनुशासन बनाए रखती हैं तो आने वाले वर्षों में वह ओलंपिक जैसे सबसे बड़े मंच पर भी भारत के लिए पदक जीतने की क्षमता रखती हैं। उनके अनुसार यामिनी का आत्मविश्वास, तकनीकी कौशल और लगातार सुधार करने की इच्छा उन्हें भविष्य का बड़ा खिलाड़ी बनाती है।
मध्यप्रदेश में जश्न का माहौल
कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर जीतने के बाद सागर सहित पूरे मध्यप्रदेश में खुशी का माहौल है। खेल प्रेमी और स्थानीय लोग यामिनी की इस उपलब्धि को प्रदेश के लिए गौरव का क्षण बता रहे हैं। उनकी सफलता से प्रदेश के युवा खिलाड़ियों, खासकर बेटियों को नई प्रेरणा मिली है।