भोपाल. कान्हा टाइगर रिजर्व में केनाइन डिस्टेम्पर वायरस (CDV) का प्रकोप वन्यजीव संरक्षण के लिए गंभीर चुनौती बन गया है। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार हाल ही में एक और संक्रमित बाघ की मौत होने से रिजर्व में चिंता और बढ़ गई है। लगातार हो रही मौतों ने वन्यजीव विशेषज्ञों और संरक्षण एजेंसियों को सतर्क कर दिया है।
बीमार हालत में मिला था बाघ
4 जून 2026 को किसली परिक्षेत्र के संदूक खोल क्षेत्र में हाथी गश्ती दल को एक बाघ अत्यंत कमजोर और असामान्य स्थिति में दिखाई दिया था। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और बाघ को तत्काल रेस्क्यू कर मुक्की क्वॉरेंटाइन सेंटर में भर्ती कराया गया। प्रारंभिक चिकित्सकीय जांच में उसमें केनाइन डिस्टेम्पर वायरस के स्पष्ट लक्षण पाए गए थे।
विशेषज्ञों की निगरानी में चला इलाज
बाघ के उपचार के लिए वन विभाग ने विशेष चिकित्सा व्यवस्था की थी। इलाज में वाइल्ड लाइफ कंजरवेशन ट्रस्ट और Nanaji Deshmukh Veterinary Science University के विशेषज्ञ भी शामिल थे। लगातार निगरानी, दवाओं और विशेष देखभाल के बावजूद बाघ की स्थिति में सुधार नहीं हो सका और अंततः उसने उपचार के दौरान दम तोड़ दिया।
बाघिन और चार शावकों की मौत ने बढ़ाई चिंता
कान्हा में इस संक्रमण का पहला बड़ा मामला सरही परिक्षेत्र के अमाही क्षेत्र में सामने आया था। यहां बाघिन टी-141 के चार शावकों में से एक का शव 21 अप्रैल को मिला था। इसके बाद अगले दो दिनों में दो अन्य शावकों की भी मौत हो गई। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग ने बाघिन और उसके बचे हुए शावक को रेस्क्यू कर क्वॉरेंटाइन सेंटर में रखा, लेकिन संक्रमण के आगे सभी प्रयास नाकाम साबित हुए।
नौ दिनों में खत्म हो गया पूरा परिवार
संक्रमण का असर इतना घातक साबित हुआ कि 29 अप्रैल को बाघिन की भी मौत हो गई। इसके कुछ समय बाद उसके जीवित बचे अंतिम शावक ने भी दम तोड़ दिया। इस तरह मात्र नौ दिनों के भीतर एक बाघिन और उसके चारों शावकों की मौत हो गई। अब ताजा मामले के बाद मृत बाघों की संख्या बढ़कर सात हो चुकी है, जिसने वन्यजीव संरक्षण तंत्र की चिंता बढ़ा दी है।
क्या है केनाइन डिस्टेम्पर वायरस?
केनाइन डिस्टेम्पर वायरस एक अत्यंत संक्रामक वायरल रोग है, जो आमतौर पर कुत्तों और अन्य मांसाहारी वन्यजीवों को प्रभावित करता है। यह वायरस श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र और तंत्रिका तंत्र पर गंभीर असर डालता है। संक्रमित जानवरों में कमजोरी, भूख कम लगना, असामान्य व्यवहार और न्यूरोलॉजिकल समस्याएं देखी जाती हैं। यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया जाए तो यह किसी भी वन्यजीव आबादी के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
निगरानी और रोकथाम पर बढ़ा फोकस
लगातार हो रही मौतों के बाद वन विभाग ने रिजर्व क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी है। संक्रमित या संदिग्ध वन्यजीवों की पहचान, क्वॉरेंटाइन व्यवस्था और नियमित स्वास्थ्य जांच पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संक्रमण को जल्द नियंत्रित नहीं किया गया तो इसका असर कान्हा के बाघ संरक्षण कार्यक्रम पर पड़ सकता है, जो देश के सबसे महत्वपूर्ण टाइगर लैंडस्केप में से एक माना जाता है।