MP News: मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि सुशासन का सबसे मजबूत आधार न्याय है और राज्य सरकार प्रदेश के हर नागरिक को न्याय सुनिश्चित करने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ काम कर रही है। उन्होंने कहा कि न्याय केवल अदालतों तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक उसकी पहुंच होना जरूरी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव शनिवार, 8 अगस्त को इंदौर के ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में आयोजित 'Enhancing Access to Justice' वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे। सम्मेलन में देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत सहित सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के न्यायाधीश, विधिक सेवा प्राधिकरणों के वरिष्ठ अधिकारी और अन्य जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।
न्याय सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी- सीएम मोहन यादव
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की न्याय व्यवस्था की जड़ें हजारों साल पुरानी परंपराओं से जुड़ी हैं। संविधान ने इन परंपराओं को आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ जोड़ा है। भारतीय न्यायालयों को लोग न्याय के मंदिर के रूप में देखते हैं और न्याय की उम्मीद लेकर अदालत की चौखट तक पहुंचते हैं। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश सरकार न्यायपालिका की भावना के अनुरूप उपलब्ध सभी संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए प्रदेश के प्रत्येक नागरिक के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। सीएम ने मध्यस्थता को भी महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे विवादों को बातचीत और सहमति से हल करने की कोशिश करने से अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम किया जा सकता है।
पंच परमेश्वर से लेकर गीता तक, भारतीय न्याय परंपरा का दिया उदाहरण
डॉ. मोहन यादव ने भारतीय समाज की पारंपरिक न्याय व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि पंच परमेश्वर की परंपरा में विवादों को समझाइश और समझौते के जरिए सुलझाने की व्यवस्था रही है। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के गीता संदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि महाभारत जैसे भीषण संघर्ष से पहले भी उन्होंने समाधान निकालने और युद्ध को टालने का प्रयास किया था। मुख्यमंत्री के मुताबिक भारतीय संविधान में देश की हजारों वर्षों पुरानी न्याय परंपरा और आधुनिक व्यवस्था का बेहतरीन समन्वय देखने को मिलता है।
पीएम मोदी के नेतृत्व में बदलाव का दौर- मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश बदलाव के एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने अंग्रेजों के समय के कई गैर-जरूरी कानूनों को समाप्त किया है, जिससे न्याय व्यवस्था को सरल और नागरिक केंद्रित बनाने में मदद मिली है। उन्होंने आधुनिक न्याय प्रणाली में ई-केस फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई, डिजिटल डेटा और आधुनिक न्याय प्रबंधन जैसी तकनीकों के बढ़ते इस्तेमाल का भी उल्लेख किया। सीएम ने कहा कि जनविश्वास अधिनियम के जरिए छोटे उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने जैसे कदम न्याय व्यवस्था को ज्यादा सरल और नागरिक हितैषी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं।
मध्यप्रदेश में UCC विधेयक का भी किया जिक्र
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार भी न्याय और समानता की दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि हाल में विधानसभा में समान नागरिक संहिता यानी UCC से संबंधित विधेयक पारित किया गया है। उन्होंने कहा कि यह विधेयक पूर्व न्यायाधीश रंजना देसाई की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार सभी धर्मों के सम्मान और सर्वधर्म सद्भाव के सिद्धांत पर काम करती है और किसी भी धर्म के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा।
पेपर लीक मामलों के लिए 4 फास्ट ट्रैक कोर्ट
मुख्यमंत्री ने युवाओं से जुड़े मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि पेपर लीक और धोखाधड़ी जैसे मामलों में तेजी से न्याय दिलाने के लिए मध्यप्रदेश में चार फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित किए गए हैं। उन्होंने बताया कि हाईकोर्ट जबलपुर के सहयोग से इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर में 24 घंटे के भीतर फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित किए गए। सीएम ने कहा कि युवाओं के भविष्य से जुड़े मामलों में तेजी से कार्रवाई जरूरी है, ताकि उन्हें लंबे समय तक न्याय की प्रतीक्षा न करनी पड़े।
'न्याय में देरी भी अन्याय'
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि न्याय में देरी को भी अन्याय के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने मध्यप्रदेश में साइबर सुरक्षा, राष्ट्रीय स्वचालित प्रणाली और ई-जीरो एफआईआर जैसी व्यवस्थाओं के जरिए पुलिसिंग को आधुनिक बनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि तकनीक के इस्तेमाल से पुलिस और न्याय व्यवस्था को वर्तमान समय की जरूरतों के अनुरूप मजबूत किया जा रहा है।
अहिल्याबाई होलकर और सम्राट विक्रमादित्य के न्याय का उदाहरण
मुख्यमंत्री ने मालवा की ऐतिहासिक न्याय परंपरा का जिक्र करते हुए लोकमाता अहिल्याबाई होलकर और सम्राट विक्रमादित्य के उदाहरण प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि करीब 250 वर्ष पहले अहिल्याबाई होलकर ने इंदौर में सुशासन और न्याय की मिसाल कायम की। उनके शासन में न्याय करते समय शासक और आम नागरिक के बीच भेदभाव नहीं किया जाता था। मुख्यमंत्री ने सम्राट विक्रमादित्य के न्याय से जुड़े प्रसंग का भी उल्लेख किया और कहा कि भारतीय इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां व्यक्तिगत संबंधों से ऊपर न्याय को प्राथमिकता दी गई।
CJI जस्टिस सूर्यकांत बोले- संवाद से बनेगा न्याय की पहुंच का रास्ता
कार्यक्रम को भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि सशक्त भविष्य, गरिमा और समावेशन केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि विधिक सहायता की वास्तविक भावना हैं। उन्होंने लोकमाता अहिल्याबाई होलकर के शासन और उनके नागरिकों से सीधे संवाद का उदाहरण देते हुए कहा कि इंदौर में इस तरह के सम्मेलन का आयोजन विशेष महत्व रखता है। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि केवल कानून बनाना ही न्याय की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए संवाद जरूरी है। पीड़ित व्यक्ति की समस्या को पहले सुना जाना चाहिए और उसे यह भरोसा होना चाहिए कि उसकी बात को गंभीरता से लिया जा रहा है।
गरीब और वंचितों को कानूनी मदद चैरिटी नहीं
CJI ने कहा कि गरीब, आर्थिक रूप से कमजोर और महिलाओं को विधिक सहायता देना किसी तरह की चैरिटी नहीं है। यह उनके अधिकारों और गरिमा से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था की असली परीक्षा तब है जब कोई व्यक्ति खुद मदद लेने के लिए हमारे पास नहीं पहुंच पाया हो। ऐसे लोगों तक व्यवस्था को खुद पहुंचना होगा। उन्होंने पैरा लीगल वॉलंटियर्स को समाज और न्याय व्यवस्था के बीच महत्वपूर्ण कड़ी बताया।
हर समुदाय की समस्या का समाधान अलग हो सकता है
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि पश्चिमी क्षेत्र में अलग-अलग समुदायों की समस्याएं अलग प्रकृति की हैं। मध्यप्रदेश के जनजातीय समुदाय, गोवा के मछुआरे, गुजरात के प्रवासी श्रमिक और मुंबई में रहने वाली महिलाओं की कानूनी जरूरतें एक जैसी नहीं हो सकतीं। इसलिए सभी समस्याओं के लिए एक ही समाधान लागू नहीं किया जा सकता। स्थानीय परिस्थितियों और लोगों की भाषा को समझकर समाधान तैयार करना जरूरी है। उन्होंने डॉक्टर का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह डॉक्टर मरीज से बातचीत कर उसकी परेशानी समझता है, उसी तरह न्याय व्यवस्था को भी पीड़ित और समुदाय से संवाद करना होगा।
न्याय में समानता का भाव जरूरी
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि समाज के अंतिम छोर तक न्याय पहुंचाना ही वास्तविक समानता है। हमें यह देखना होगा कि विकास और अधिकारों की प्रक्रिया में कोई व्यक्ति पीछे तो नहीं छूट गया। उन्होंने कहा कि समानता और न्याय तक पहुंच प्रत्येक नागरिक का अधिकार है और इसे सुनिश्चित करना सभी की जिम्मेदारी है। उनके अनुसार, संवाद से हर समस्या को सुना जा सकता है, गरिमा से लोगों के साथ सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित होता है और समावेशन से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि कोई व्यक्ति व्यवस्था से बाहर न रह जाए।
केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने भी रखे विचार
केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि न्याय केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक न्याय की पहुंच बनाना सरकार और न्याय व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 39A का उल्लेख करते हुए कहा कि आर्थिक और सामाजिक स्थिति के कारण कोई व्यक्ति न्याय से वंचित नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत की न्याय परंपरा में नैतिकता, समानता और लोक कल्याण का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक भी न्याय व्यवस्था को बहुभाषीय और अधिक सुलभ बनाने में मदद कर रही है। उन्होंने राजा भोज और अहिल्याबाई होलकर की परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सुशासन की वास्तविक बुनियाद न्याय है।
मध्यस्थता से विवादों का आसान समाधान
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि नालसा की शिक्षा योजना और इंडियन साइन लैंग्वेज में थीम सॉन्ग जैसे प्रयास न्याय की पहुंच को व्यापक बनाने में मदद करेंगे। ब्रेल लिपि में विधिक सेवाओं की गाइड जारी किए जाने को उन्होंने दिव्यांगजनों के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने मध्यस्थता पर शुरू किए गए 'विवाद से सहमति' सर्टिफिकेट कोर्स का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि परिवार, पड़ोस और साझेदारी से जुड़े कई विवाद बातचीत के माध्यम से अदालत जाने से पहले ही सुलझाए जा सकते हैं।
सभी नागरिकों को मिले न्याय तक आसान पहुंच
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मनमोहन ने कहा कि न्याय सिर्फ कानूनों और अदालतों की मौजूदगी से सुनिश्चित नहीं होता। लोगों में यह विश्वास होना चाहिए कि मुश्किल आने पर वे उचित मंच तक पहुंच सकते हैं और उन्हें समाधान मिलेगा। उन्होंने न्याय व्यवस्था में संवाद, सम्मान और समानता को मजबूत करने पर जोर दिया। उनके मुताबिक मध्यस्थता मामलों के समाधान का प्रभावी माध्यम बन सकती है। उन्होंने कहा कि न्याय की समान पहुंच समाज के प्रत्येक वर्ग के साथ-साथ जनजातीय समुदायों के लिए भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
सम्मेलन में कई योजनाओं और कार्यक्रमों का शुभारंभ
इंदौर में आयोजित सम्मेलन के दौरान कई महत्वपूर्ण प्रकाशनों और कार्यक्रमों का शुभारंभ किया गया। इनमें 'Ensuring Access Protecting Rights Building Futures' पुस्तक, निवारक एवं रणनीतिक विधिक सेवा योजनाओं से संबंधित सामग्री, ब्रेल लिपि में मार्गदर्शिका और 'न्याय के स्वर' पुस्तक शामिल रही। कार्यक्रम में नालसा का थीम सॉन्ग भी प्रस्तुत किया गया। CJI जस्टिस सूर्यकांत ने नालसा शिक्षा स्कीम और थीम सॉन्ग को इंडियन साइन लैंग्वेज में लॉन्च किया। इसके अलावा मध्यस्थता पर सर्टिफिकेट कोर्स और Justice to Children Litigation Fellowship Programme का भी शुभारंभ किया गया।
सम्मेलन में ये न्यायाधीश और अधिकारी रहे मौजूद
कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस विजय बिश्नोई, जस्टिस आलोक अराधे, जस्टिस शील नागु और जस्टिस संजीव सचदेवा सहित सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के न्यायाधीश उपस्थित रहे। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल, न्यायमूर्ति आनंद पाठक सहित कई न्यायिक अधिकारी, विधिक सेवा प्राधिकरणों के वरिष्ठ पदाधिकारी और इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव भी कार्यक्रम में मौजूद रहे। कार्यक्रम के अंत में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आनंद पाठक ने आभार व्यक्त किया।