पेपर लीक और संगठित परीक्षा धांधली के खिलाफ सजा कड़ी करने वाला लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक, 2026 संसद से पारित हो गया है। लोकसभा ने इसे 29 जुलाई और राज्यसभा ने 30 जुलाई को मंजूरी दी। राज्यसभा में विधेयक ध्वनिमत से पारित हुआ। अब इसे कानून का रूप लेने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार है। विधेयक पारित होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर वीडियो संदेश जारी किया। उन्होंने इसे परीक्षा व्यवस्था में भरोसा बढ़ाने वाला कदम बताते हुए कहा कि पेपर लीक गिरोहों और छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
पीएम मोदी बोले—पेपर लीक माफिया को नहीं मिलेगी छूट
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें लंबे समय से पेपर लीक तथा परीक्षा धांधली की समस्या का सामना कर रही हैं। ऐसी घटनाओं से मेहनत करने वाले लाखों विद्यार्थियों और नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं का भविष्य प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि सरकार परीक्षा प्रणाली में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने, विशेष जांच व्यवस्था तैयार करने और मामलों की तेज सुनवाई सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रही है। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट संदेश दिया कि बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले संगठित गिरोहों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।
2024 के कानून में क्या बदलाव करेगा नया विधेयक?
नया विधेयक लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) अधिनियम, 2024 में संशोधन करता है। इसका मुख्य उद्देश्य जेल की अवधि और जुर्माना बढ़ाने के साथ जांच, ट्रायल और अपील की प्रक्रिया को समयबद्ध बनाना है।
| अपराध की श्रेणी | 2024 के अधिनियम में प्रावधान | 2026 के संशोधन में प्रावधान |
|---|---|---|
| किसी व्यक्ति द्वारा अनुचित साधनों का इस्तेमाल | 3 से 5 वर्ष की जेल और ₹10 लाख तक जुर्माना | 5 से 10 वर्ष की जेल और ₹50 लाख तक जुर्माना |
| दोषी परीक्षा सेवा प्रदाता | ₹1 करोड़ तक जुर्माना और 4 वर्ष का प्रतिबंध | ₹5 करोड़ तक जुर्माना और 8 वर्ष का प्रतिबंध |
| सेवा प्रदाता के निदेशक या जिम्मेदार अधिकारी की मिलीभगत | 3 से 10 वर्ष की जेल और ₹1 करोड़ जुर्माना | 5 से 10 वर्ष की जेल और ₹5 करोड़ जुर्माना |
| संगठित परीक्षा अपराध | 5 से 10 वर्ष की जेल और न्यूनतम ₹1 करोड़ जुर्माना | 7 से 10 वर्ष की जेल और न्यूनतम ₹10 करोड़ जुर्माना |
विधेयक के कानूनी पाठ के अनुसार संगठित अपराध के मामलों में जुर्माना ₹10 करोड़ तक नहीं, बल्कि कम-से-कम ₹10 करोड़ होगा। संस्था के संगठित अपराध में शामिल पाए जाने पर संपत्ति जब्त करने और परीक्षा पर आया आनुपातिक खर्च वसूलने का प्रावधान मूल अधिनियम में पहले से मौजूद है।
दोषी सेवा प्रदाता आठ साल तक परीक्षा कार्य से बाहर
परीक्षा कराने वाली एजेंसी या सेवा प्रदाता की भूमिका सामने आने पर उस पर ₹5 करोड़ तक जुर्माना लगाया जा सकेगा। इसके साथ परीक्षा कराने में आया आनुपातिक खर्च भी वसूला जा सकता है।
ऐसे सेवा प्रदाता को आठ वर्ष तक किसी सार्वजनिक परीक्षा से जुड़ी जिम्मेदारी नहीं दी जा सकेगी। उसके निदेशक, वरिष्ठ प्रबंधन या जिम्मेदार अधिकारी की सहमति अथवा मिलीभगत साबित होने पर पांच से 10 वर्ष तक की जेल और ₹5 करोड़ जुर्माने का प्रावधान है।
पेपर लीक की जांच दो महीने में करनी होगी पूरी
विधेयक के अनुसार अपराध की जांच संबंधित पुलिस अधिकारी, केंद्रीय जांच एजेंसी या केंद्र सरकार द्वारा गठित विशेष कार्यबल—एसटीएफ—को दो महीने के भीतर पूरी करनी होगी।
केंद्र सरकार आवश्यकता पड़ने पर किसी मामले की जांच के लिए विशेष कार्यबल गठित कर सकेगी। एसटीएफ गठित होने के बाद संबंधित जांच उसी कार्यबल द्वारा की जाएगी।
हर राज्य में विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट का प्रावधान
राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों को संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श कर सत्र न्यायालय को विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट के रूप में नामित करना होगा।
इन अदालतों में मामलों की सुनवाई रोजाना आधार पर की जाएगी। आरोपपत्र दाखिल होने की तारीख से तीन महीने के भीतर ट्रायल पूरा करने का प्रावधान है। लंबित मामले भी विशेष अदालतों में स्थानांतरित किए जा सकेंगे और स्थानांतरण के बाद उनका ट्रायल तीन महीने में पूरा करना होगा।
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में बताया कि सार्वजनिक परीक्षा अपराधों की सुनवाई के लिए छह विशेष फास्ट ट्रैक अदालतें पहले से काम कर रही हैं और आगे ऐसी और अदालतें स्थापित करने की योजना है।
विशेष लोक अभियोजक और हाई कोर्ट में अपील
प्रत्येक विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए राज्य सरकार या केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन एक अथवा अधिक विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करेगा।
विशेष अदालत के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट की दो न्यायाधीशों वाली पीठ में अपील की जा सकेगी। विधेयक में अपील स्वीकार होने के बाद तीन महीने के भीतर उसका निपटारा करने का लक्ष्य रखा गया है। सामान्य रूप से अपील 30 दिन में दाखिल करनी होगी और उचित कारण होने पर अधिकतम 90 दिन तक स्वीकार की जा सकेगी।
कानून केवल प्रश्नपत्र लीक तक सीमित नहीं
डॉ. जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में कहा कि परीक्षा कानून का दायरा केवल प्रश्नपत्र लीक तक सीमित नहीं है। मूल 2024 अधिनियम में पहले से कई तरह की गतिविधियों को अनुचित साधन और अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इनमें शामिल हैं:
- प्रश्नपत्र या उत्तर कुंजी लीक करना
- बिना अनुमति प्रश्नपत्र या ओएमआर शीट हासिल करना
- उत्तर पुस्तिका, ओएमआर शीट या मूल्यांकन में छेड़छाड़
- कंप्यूटर नेटवर्क, कंप्यूटर सिस्टम या डिजिटल संसाधन से छेड़छाड़
- परीक्षा की तारीख, शिफ्ट या बैठने की व्यवस्था में हेरफेर
- फर्जी वेबसाइट, फर्जी परीक्षा, एडमिट कार्ड या नियुक्ति पत्र तैयार करना
- परीक्षा के दौरान किसी अभ्यर्थी को अनधिकृत सहायता उपलब्ध कराना।
तकनीकी रूप से ये अपराध 2026 के संशोधन में पहली बार नहीं जोड़े गए हैं। इनका दायरा 2024 के मूल अधिनियम में पहले से निर्धारित है; नया विधेयक मुख्य रूप से सजा, जुर्माना और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक सख्त तथा समयबद्ध बनाता है।
किन परीक्षाओं पर लागू है केंद्रीय अधिनियम?
2024 के केंद्रीय अधिनियम की अनुसूची में इन संस्थाओं द्वारा आयोजित परीक्षाएं शामिल हैं:
UPSC, SSC, रेलवे भर्ती बोर्ड, IBPS, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यानी NTA, केंद्र सरकार के मंत्रालय और विभाग तथा केंद्र द्वारा अधिसूचित अन्य परीक्षा प्राधिकरण।
कानूनी पाठ के आधार पर इसे स्वतः देश की हर स्कूल, विश्वविद्यालय या राज्य भर्ती परीक्षा पर लागू कानून बताना सही नहीं होगा। राज्य स्तरीय परीक्षा पर संबंधित राज्य कानून, अधिसूचना या लागू केंद्रीय प्रावधानों की अलग से जांच आवश्यक होगी। मूल 2024 विधेयक के उद्देश्यों में इसे राज्यों के लिए मॉडल कानून के रूप में भी प्रस्तुत किया गया था।
सामान्य अभ्यर्थियों के लिए क्या प्रावधान है?
2024 के मूल कानून के उद्देश्यों और कारणों के वक्तव्य में कहा गया था कि इसका मुख्य निशाना आर्थिक लाभ के लिए परीक्षा व्यवस्था में सेंध लगाने वाले व्यक्ति, संस्थाएं और संगठित गिरोह हैं।
उस वक्तव्य के अनुसार सामान्य अभ्यर्थियों से जुड़े अनुशासन या नकल के मामलों पर संबंधित परीक्षा प्राधिकरण के मौजूदा प्रशासनिक नियम लागू रहेंगे। हालांकि किसी विशेष मामले में कानूनी जिम्मेदारी उसके तथ्यों, व्यक्ति की भूमिका और जांच में सामने आए साक्ष्यों पर निर्भर करेगी।
बायोमेट्रिक, AI फेस ऑथेंटिकेशन और CCTV पर जोर
डॉ. जितेंद्र सिंह ने सदन को बताया कि सार्वजनिक परीक्षा व्यवस्था को सुरक्षित बनाने के लिए गठित उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति की 46 सिफारिशों में से 35 लागू की जा चुकी हैं।
सरकार के अनुसार इन उपायों में आधार आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, एआई समर्थित फेस ऑथेंटिकेशन, बहुस्तरीय तलाशी, सीसीटीवी निगरानी, सिग्नल जैमर, राज्य एवं जिला समन्वय समितियां, शिकायत निवारण प्रणाली और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी का पुनर्गठन शामिल है।
मंत्री ने यह भी कहा कि ऑनलाइन आवेदन, कुछ सरकारी भर्तियों में इंटरव्यू समाप्त करने, प्रोविजनल आंसर-की जारी करने और साइबर सुरक्षा मजबूत करने जैसे कदम पहले ही उठाए जा चुके हैं।
शिक्षा और मेडिकल संस्थानों के आंकड़े भी रखे
राज्यसभा में चर्चा के दौरान डॉ. जितेंद्र सिंह ने सरकार के शिक्षा संबंधी आंकड़े भी पेश किए। उनके अनुसार देश में विश्वविद्यालयों की संख्या 760 से बढ़कर 1,293 और उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या 51,534 से बढ़कर 64,896 हो गई है।
उन्होंने कहा कि एम्स की संख्या सात से बढ़कर 22, मेडिकल कॉलेजों की संख्या 387 से 844, स्नातक मेडिकल सीटें 51,300 से करीब 1.39 लाख और पीजी मेडिकल सीटें 31,000 से बढ़कर 86,300 हुई हैं। ये आंकड़े मंत्री द्वारा राज्यसभा में दिए गए बयान पर आधारित हैं।
राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद बनेगा कानून
संसद से पारित होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। मंजूरी और आवश्यक राजपत्र अधिसूचना के बाद संशोधित प्रावधान कानून का रूप लेंगे। 31 जुलाई 2026 को उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड में इसे संसद से पारित विधेयक के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। इसलिए राष्ट्रपति की मंजूरी की पुष्टि होने तक खबर में “नया कानून लागू” लिखने के बजाय “विधेयक संसद से पारित” लिखना अधिक सटीक होगा।