कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। उत्तर 24 परगना के कद्दावर नेता फिरदौस कमाल उद्दीन, जिन्हें राजनीतिक हलकों में 'बाबू मास्टर' के नाम से जाना जाता है, उन्होंने आखिरकार अपना सियासी वनवास खत्म कर दिया है। पिछले कुछ समय से सक्रिय राजनीति से दूरी बनाने और पाला बदलने की अटकलों के बीच, बाबू मास्टर ने औपचारिक रूप से तृणमूल कांग्रेस (TMC) का दामन थाम लिया है। उनकी इस घर वापसी ने न केवल जिले की राजनीति को गर्मा दिया है, बल्कि विपक्षी खेमे में भी बेचैनी बढ़ा दी है।
बशीरहाट के सियासी समीकरणों में आएगा बड़ा बदलाव
बाबू मास्टर की वापसी को केवल एक दल परिवर्तन के रूप में नहीं देखा जा रहा है, बल्कि इसे बशीरहाट और उत्तर 24 परगना के सीमावर्ती इलाकों में तृणमूल की पकड़ और मजबूत करने की रणनीति माना जा रहा है। लंबे समय तक संगठन में काम करने वाले बाबू मास्टर का इस क्षेत्र के अल्पसंख्यकों और स्थानीय मतदाताओं पर गहरा प्रभाव माना जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनके आने से टीएमसी को उन बूथों पर मजबूती मिलेगी जहाँ पिछले चुनावों में भाजपा ने सेंधमारी की थी।
विरोधियों के लिए बड़ी चुनौती
जैसे ही बाबू मास्टर के टीएमसी में शामिल होने की खबर पुख्ता हुई, विपक्षी दलों, खासकर भाजपा के खेमे में हलचल तेज हो गई है। जिले में भाजपा के संगठन को मजबूत करने में कभी अहम भूमिका निभाने वाले नेता का वापस जाना भगवा खेमे के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। सूत्रों की मानें तो उनकी वापसी के बाद कई अन्य स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के भी जल्द ही 'घास-फूल' के झंडे के नीचे आने की संभावना है, जो आगामी चुनावों से पहले विपक्ष की धड़कनें बढ़ाने के लिए काफी है।
संगठन में मिली नई जिम्मेदारी के संकेत
तृणमूल नेतृत्व ने बाबू मास्टर की वापसी का गर्मजोशी से स्वागत किया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, उन्हें जिले में कोई बड़ी सांगठनिक जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। भाजपा से मोहभंग होने के बाद उन्होंने ममता बनर्जी के नेतृत्व और विकास कार्यों पर भरोसा जताया है। बाबू मास्टर ने मीडिया से मुखातिब होते हुए साफ किया कि उनका मकसद केवल जनता की सेवा करना है और वह अपनी पुरानी पार्टी के साथ मिलकर इलाके के विकास को नई गति देंगे।