सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर से जुड़े बहुचर्चित मामले पर मंगलवार से सुनवाई शुरू हो गई है। इस मामले की सुनवाई के लिए 9 जजों की संविधान पीठ का गठन किया गया है, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत कर रहे हैं। यह पीठ 2018 के ऐतिहासिक फैसले के खिलाफ दाखिल समीक्षा याचिकाओं पर विचार करेगी।
समय-सीमा पर सख्त रुख
संविधान पीठ ने सभी पक्षों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे तय समय-सीमा के भीतर ही अपने तर्क रखें। अदालत ने कहा कि कई महत्वपूर्ण मामले लंबित हैं, इसलिए किसी भी पक्ष को अतिरिक्त समय नहीं दिया जाएगा। इससे यह संकेत मिलता है कि अदालत इस संवेदनशील मामले में तेजी से निर्णय की दिशा में बढ़ रही है।
किन मुद्दों पर होगी सुनवाई
सुनवाई के दौरान सिर्फ सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा ही नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े कई बड़े सवालों पर भी विचार होगा। इनमें शामिल हैं:
- मस्जिदों और दरगाहों में महिलाओं का प्रवेश
- पारसी महिलाओं के अग्नि मंदिरों में प्रवेश का अधिकार
- धार्मिक प्रथाओं के नाम पर बहिष्कार
- दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला जननांग विकृति की वैधता
ये सभी मुद्दे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार से जुड़े हैं।
सुनवाई का पूरा शेड्यूल
अदालत ने इस मामले की सुनवाई के लिए विस्तृत कार्यक्रम तय किया है:
- 7–9 अप्रैल: समीक्षा याचिकाओं के समर्थन में दलीलें
- 14–16 अप्रैल: विरोध करने वाले पक्षों की दलीलें
- 21 अप्रैल: जवाबी दलीलें
- 22 अप्रैल: एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) की अंतिम प्रस्तुति
सभी पक्षों को पहले से लिखित दलीलें जमा करने का निर्देश भी दिया गया है।
केंद्र सरकार और अन्य पक्षों का रुख
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार समीक्षा याचिकाओं का समर्थन कर रही है। उन्होंने तर्क दिया कि हर धर्म और परंपरा की अपनी अलग प्रथाएं होती हैं, इसलिए सबरीमाला को भी उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। वहीं, त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने अदालत से आग्रह किया है कि धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं की न्यायिक पुनर्व्याख्या से बचा जाए।
क्या है मामला?
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गई थीं, जिन पर अब विस्तृत सुनवाई हो रही है।