बिहार: बिहार में एक बार फिर बाढ़ का संकट गहरा गया है। नेपाल में हो रही भारी बारिश का सीधा असर बिहार की नदियों के जलस्तर पर दिखाई दे रहा है। गंडक, कोसी और बागमती समेत कई नदियां उफान पर हैं। मौजूदा स्थिति में छह जिलों में करीब 2.03 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित बताए जा रहे हैं। कई इलाकों में पानी तेजी से फैल रहा है और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की जरूरत पड़ रही है। तटबंध टूटने से हालात और चुनौतीपूर्ण हो गए हैं। लेकिन बिहार में बाढ़ की यह कहानी सिर्फ 2026 तक सीमित नहीं है। दशकों से हर मानसून के साथ राज्य के कई हिस्से बाढ़ की मार झेलते रहे हैं।
छह जिलों में टूटे तटबंध, कई इलाकों में फैला पानी
गंडक नदी के तेज बहाव ने छह जिलों में छह तटबंधों को नुकसान पहुंचाया है। सारण के मकेर में सारण मुख्य तटबंध दो जगह टूट गया है। बताया जा रहा है कि यहां करीब 160 फीट हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ है। गोपालगंज के बैकुंठपुर में जमींदारी बांध भी ध्वस्त हो गया। पश्चिम चंपारण में बगहा, बैरिया और योगापट्टी में भी तीन जगह तटबंध टूटने की जानकारी सामने आई है। इसके बाद आसपास के इलाकों में बाढ़ का पानी फैलने लगा है। प्रशासन के सामने लोगों को सुरक्षित रखने और पानी की निकासी की बड़ी चुनौती है। निचले इलाकों में रहने वाले लोगों की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं।
बाढ़ के पानी के साथ रिहायशी इलाकों तक पहुंचे वन्यजीव
बिहार में बढ़ते बाढ़ के पानी का असर सिर्फ इंसानों पर ही नहीं पड़ रहा, बल्कि वन्यजीव भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। सारण में गंडक नदी की तेज धार में दो तेंदुए बहते हुए दिखाई दिए। इनमें से एक तेंदुआ तैरकर किनारे पहुंचा और बाद में एक पेड़ पर चढ़ गया। वहीं दूसरा तेंदुआ पानी के तेज बहाव के साथ आगे बह गया। पश्चिम चंपारण के बगहा में भी बाढ़ का पानी वन्यजीवों को रिहायशी इलाकों की ओर ला रहा है। ठकराहा के भवानी टोला में एक मगरमच्छ घर के अंदर घुस गया। मगरमच्छ के घर में पहुंचने की खबर से इलाके में अफरातफरी मच गई।
पटना से बेगूसराय और खगड़िया तक बढ़ रहा गंगा का जलस्तर
गंडक और दूसरी नदियों के साथ गंगा नदी का जलस्तर भी लगातार बढ़ रहा है। पटना में गंगा के कई घाट एक बार फिर पानी में डूब गए हैं। नदी के बढ़ते जलस्तर को देखते हुए आसपास के इलाकों में भी चिंता बढ़ रही है। बेगूसराय और खगड़िया में भी बाढ़ का खतरा बढ़ता दिखाई दे रहा है। नदी किनारे बसे गांवों और निचले इलाकों के लोगों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है। जलस्तर बढ़ने के साथ प्रशासन को निगरानी बढ़ानी पड़ रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में बारिश और नदियों के जलस्तर पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा।
बिहार का करीब 73 फीसदी इलाका बाढ़ प्रभावित
बिहार देश के सबसे ज्यादा बाढ़ प्रभावित राज्यों में शामिल है। राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल करीब 94,163 वर्ग किलोमीटर है। इसमें लगभग 68,800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र बाढ़ प्रभावित माना जाता है। यानी राज्य का करीब 73 फीसदी हिस्सा बाढ़ के खतरे वाले क्षेत्र में आता है। उत्तर बिहार की स्थिति और भी ज्यादा गंभीर है। यहां करीब 76 फीसदी आबादी ऐसे इलाकों में रहती है, जहां बाढ़ का खतरा बना रहता है। यही वजह है कि बिहार में बाढ़ को सिर्फ अचानक आने वाली प्राकृतिक आपदा नहीं माना जा सकता। यह ऐसा संकट है जो लगभग हर मानसून के साथ कई इलाकों में लौटता है।
बिहार में बाढ़ सिर्फ बारिश से नहीं आती
बिहार की बाढ़ को समझने के लिए सिर्फ राज्य में होने वाली बारिश को देखना पर्याप्त नहीं है। कोसी, गंडक, बागमती, कमला बलान, बूढ़ी गंडक, अधवारा और महानंदा जैसी कई नदियों का जलग्रहण क्षेत्र नेपाल और हिमालयी इलाकों में है। ऐसे में नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में भारी बारिश होने पर उसका पानी तेजी से बिहार की ओर पहुंचता है। इससे नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ सकता है। पानी बढ़ने के साथ तटबंधों पर भी दबाव बढ़ जाता है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, झारखंड और आसपास के दूसरे क्षेत्रों में होने वाली बारिश का असर भी बिहार की नदियों पर पड़ सकता है। इसलिए बिहार की बाढ़ कई इलाकों की बारिश और नदी तंत्र से जुड़ी हुई है।
1987 की बाढ़ ने मचाई थी भारी तबाही
बिहार के बाढ़ इतिहास में 1987 की बाढ़ को बेहद गंभीर घटनाओं में गिना जाता है। उस साल 30 जिले और करीब 24,518 गांव बाढ़ से प्रभावित हुए थे। इस बाढ़ में करीब 1,399 लोगों की मौत हुई थी। 5,000 से ज्यादा जानवरों के मारे जाने की जानकारी भी सामने आई थी। फसलों को करीब 678 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। इस आपदा ने यह दिखाया कि बाढ़ का असर केवल घरों और सड़कों तक सीमित नहीं रहता। इसके कारण बीमारी, विस्थापन, फसल बर्बादी और रोजगार का संकट भी पैदा होता है। हजारों परिवारों को अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ता है।
1998 से 2002 तक बार-बार आई बाढ़
1987 के बाद भी बिहार में बाढ़ का सिलसिला नहीं रुका। 1998 में उत्तर बिहार की कई नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ा और बूढ़ी गंडक, बागमती, अधवारा और कोसी के तटबंध प्रभावित हुए। इस बाढ़ में 381 लोगों की मौत हुई और फसलों को भारी नुकसान पहुंचा। 1999 में नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों में असामान्य बारिश के कारण कमला बलान में अचानक बाढ़ आई। 2000 में कमला बलान और भूतही बलान के जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश हुई और अगस्त में पूर्वी कोसी तटबंध टूट गया। इस दौरान करीब 12,351 गांव प्रभावित हुए और 33 जिलों में बाढ़ का असर रहा। 2002 में भी उत्तर बिहार बाढ़ की चपेट में आया और 25 जिले प्रभावित हुए।
2004 में टूटा बाढ़ का पुराना रिकॉर्ड
2004 में उत्तर बिहार की नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में जुलाई के शुरुआती दिनों से ही भारी बारिश शुरू हो गई थी। बागमती, बूढ़ी गंडक, कमला बलान, भूतही बलान और अधवारा नदी समूह में हालात तेजी से बिगड़ते गए। बागमती में दुब्बाधार के पास जलस्तर पुराने उच्चतम स्तर से करीब 1.18 मीटर ऊपर पहुंच गया था। बूढ़ी गंडक और कमला बलान में भी रिकॉर्ड जलस्तर दर्ज किया गया। इस दौरान 53 तटबंध टूटे और करीब 9,346 गांव प्रभावित हुए। दो करोड़ से ज्यादा लोग बाढ़ की चपेट में आए और 885 लोगों की मौत हुई। फसलों और सार्वजनिक संपत्ति को भी सैकड़ों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
2007 में करीब 2.4 करोड़ लोग बाढ़ से प्रभावित
2005 और 2006 के मुकाबले 2007 में बिहार ने फिर एक बड़ी बाढ़ का सामना किया। लगभग सभी प्रमुख नदी बेसिनों में भारी बारिश हुई थी। बूढ़ी गंडक और बागमती बेसिन में लगातार बारिश के कारण नदियों का जलस्तर बढ़ता गया। कई तटबंधों में दरारें पड़ीं और 22 जिले बाढ़ से प्रभावित हुए। इस दौरान करीब 2.4 करोड़ लोग बाढ़ की चपेट में आए थे। करीब 1,287 लोगों की मौत हुई और 2,400 से ज्यादा जानवरों के मारे जाने की जानकारी सामने आई। कृषि क्षेत्र को भी बड़े स्तर पर नुकसान हुआ। यह बाढ़ बिहार के इतिहास की सबसे गंभीर बाढ़ों में शामिल रही।
2008 में कोसी ने बदला अपना रास्ता
बिहार की बाढ़ की कहानी में 2008 की कोसी बाढ़ सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक मानी जाती है। 18 अगस्त 2008 को नेपाल के कुशहा के पास पूर्वी कोसी तटबंध में दरार आई। इसके बाद कोसी नदी ने अपना रास्ता बदल लिया। पानी नेपाल के सुनसरी और सप्तरी से होते हुए बिहार के सुपौल, मधेपुरा, अररिया, सहरसा, कटिहार और पूर्णिया तक पहुंच गया। इस बाढ़ से करीब 50 लाख लोग प्रभावित हुए थे। करीब 258 लोगों की मौत हुई। कोसी के इस रूप ने एक बार फिर दिखाया कि नदी के बहाव में बदलाव कितनी बड़ी तबाही ला सकता है। इसी वजह से कोसी को बिहार के बाढ़ इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण नदी माना जाता है।
2013 से 2020 तक भी नहीं बदला बाढ़ का पैटर्न
2008 के बाद भी बिहार में बाढ़ का संकट लगातार बना रहा। 2013 में 20 जिले प्रभावित हुए और करीब 59 लाख लोग बाढ़ की चपेट में आए। 2016 में गंगा की भीषण बाढ़ ने 15 जिलों को प्रभावित किया और करीब 88 लाख लोगों पर इसका असर पड़ा। 2017 में उत्तर बिहार के 19 जिलों में बड़ी बाढ़ आई, जिसमें 1.7 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित हुए। 2019 में सीतामढ़ी और मधुबनी समेत 13 जिलों में बाढ़ का असर रहा। 2020 में कोरोना महामारी के बीच बाढ़ ने लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दीं। उस साल 19 जिलों में एक करोड़ से ज्यादा लोग बाढ़ से प्रभावित हुए। इसके बाद भी 2021 से 2023 तक कई जिलों में बाढ़ और जलभराव की स्थिति बनी रही।
2024 और 2025 में भी लाखों लोग हुए प्रभावित
बिहार में हाल के वर्षों में भी बाढ़ का संकट लगातार देखने को मिला है। 2024 में नेपाल के बराजों से बड़ी मात्रा में पानी छोड़े जाने के बाद उत्तर बिहार के कई इलाकों में स्थिति बिगड़ी थी। कई स्थानों पर तटबंध टूटने से पानी गांवों और खेतों में फैल गया था। इस दौरान करीब 11.84 लाख लोग प्रभावित हुए थे। 2025 में भी बाढ़ का असर बड़े स्तर पर देखने को मिला और करीब 47 लाख लोग प्रभावित हुए। 26 से ज्यादा लोगों की मौत की जानकारी सामने आई थी। अब 2026 में भी गंडक समेत कई नदियों के बढ़ते जलस्तर ने चिंता बढ़ा दी है। छह जिलों में तटबंध टूटने की घटनाएं इस पुराने संकट की गंभीरता को फिर सामने ला रही हैं।
आखिर बिहार में तटबंध बार-बार क्यों टूटते हैं?
बिहार में बाढ़ नियंत्रण की सबसे बड़ी चुनौतियों में तटबंधों की सुरक्षा भी शामिल है। नदियों का जलस्तर बढ़ने पर तटबंधों पर पानी का दबाव बढ़ता है। नेपाल के पहाड़ी इलाकों से अचानक बड़ी मात्रा में पानी आने पर यह दबाव और बढ़ सकता है। इसके अलावा नदी के बहाव में बदलाव और लगातार कटाव से तटबंधों के आसपास की जमीन कमजोर हो सकती है। किसी एक जगह तटबंध टूटने के बाद पानी तेजी से आसपास के गांवों और खेतों में फैल जाता है। 2026 में गंडक के तेज बहाव के कारण छह तटबंधों का टूटना इसी चुनौती की ओर इशारा करता है। सारण, गोपालगंज और पश्चिम चंपारण में हुई घटनाओं ने बाढ़ नियंत्रण व्यवस्था पर फिर सवाल खड़े किए हैं।
करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी क्यों नहीं बदल रही तस्वीर?
बाढ़ से बचाव और तटबंधों की सुरक्षा के लिए हर साल बड़ी राशि खर्च की जाती है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2020 से अब तक बाढ़ सुरक्षा पर करीब 5,100 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए जा चुके हैं। 2026 में भी बाढ़ सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं के लिए करीब 1,117 करोड़ रुपये के बजट को मंजूरी दिए जाने की बात कही गई है। सरकार की ओर से 384 परियोजनाओं पर काम कराने की जानकारी दी गई है। इसके बावजूद मानसून आते ही कई इलाकों में बाढ़ का डर लौट आता है। तटबंधों की निगरानी और मरम्मत के बावजूद कुछ जगहों पर टूटने की घटनाएं सामने आती हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ खर्च का नहीं, बल्कि बाढ़ नियंत्रण के लंबे समय के असर का भी है।
सिर्फ राहत नहीं, स्थायी समाधान की जरूरत
बिहार की बाढ़ का इतिहास बताता है कि यह सिर्फ एक साल या एक मानसून की समस्या नहीं है। नेपाल और हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली बारिश, नदियों का बदलता बहाव, कटाव और तटबंधों पर बढ़ता दबाव मिलकर स्थिति को गंभीर बनाते हैं। ऐसे में बाढ़ आने के बाद राहत पहुंचाना जरूरी है, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। नदी के पूरे जलग्रहण क्षेत्र को ध्यान में रखकर बाढ़ प्रबंधन की रणनीति तैयार करनी होगी। तटबंधों की लगातार निगरानी, कमजोर हिस्सों की पहचान और समय रहते मरम्मत पर भी ध्यान देना जरूरी है। जब तक बाढ़ को सिर्फ राहत और बचाव के नजरिए से देखने के बजाय पूरे नदी तंत्र के स्तर पर नहीं समझा जाएगा, तब तक हर मानसून में यही संकट लौट सकता है। बिहार के लिए चुनौती अब सिर्फ बाढ़ से बचने की नहीं, बल्कि लंबे समय के लिए बाढ़ के असर को कम करने की है।