कोलकाता: पश्चिम बंगाल के चुनावी दंगल में अब 'खाने की थाली' पर सियासत गरमा गई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा बीजेपी पर लगाए गए "मछली-मांस बंद करने" के आरोपों के बाद, बंगाल बीजेपी ने अपनी रणनीति बदल दी है। खुद को 'बंगाली विरोधी' टैग से बचाने के लिए बीजेपी नेताओं ने अब बाजारों और मछली की दुकानों का रुख करना शुरू कर दिया है।
ममता का आरोप और बीजेपी की 'दोहरी' रणनीति
तृणमूल कांग्रेस (TMC) लगातार बीजेपी को 'बाहरी' और 'बंगाली संस्कृति से अनजान' बता रही है। हाल ही में ममता बनर्जी ने पांशकुड़ा की रैली में दावा किया था कि— "अगर बीजेपी जीती, तो वे आपका मछली-मांस खाना बंद करवा देंगे।"
इस हमले का जवाब देने के लिए बीजेपी ने दो तरफा रणनीति अपनाई है:
1. हंसी में उड़ाना: पहले चरण में नेता इन दावों को मजाक बताकर खारिज कर रहे हैं।
2. जमीनी प्रदर्शन: दूसरे चरण में नेता खुद को बड़े 'मत्स्य प्रेमी' (Fish Lovers) के रूप में पेश कर रहे हैं।
मैदान में 'मछली' के साथ दिग्गज नेता
बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व की सलाह पर बंगाल के तमाम बड़े चेहरे अब मछली बाजारों में नजर आ रहे हैं:
दिलीप घोष: खड़गपुर के मछली बाजार में दुकानदारों से बातचीत करते दिखे। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर टीएमसी पर जबरन वसूली का आरोप भी मढ़ा।
शारद्वत मुखर्जी: साल्टलेक की सड़कों पर हाथ में बड़ी 'कातला' मछली लटकाकर घूमते नजर आए, जिसे 'जमाई षष्ठी' वाले पारंपरिक बंगाली दामाद के लुक से जोड़ा जा रहा है।
तरुणज्योति तिवारी: मछली बाजार में चुनाव प्रचार कर रहे हैं और इंटरव्यू के दौरान मछली-चावल खाते हुए खुद को टीएमसी नेताओं से बड़ा 'मछली पारखी' बता रहे हैं।
इंद्रनील खां और शंकर गुछैत: इन उम्मीदवारों को भी मछली के साथ फोटो खिंचवाते और मछली प्रेम जगजाहिर करते देखा गया है।
बीजेपी का तर्क: "स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि मां काली मांस खाती हैं। बंगाली मछली और मांस खाएंगे, इसे कोई नहीं रोक सकता।"
शमीक भट्टाचार्य, प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष (खसी के मांस के शौकीन)
टीएमसी का तंज: 'यह सिर्फ दिखावा है'
बीजेपी की इस 'मछली पॉलिटिक्स' पर टीएमसी ने तीखा हमला बोला है। बारासात की सांसद काकली घोष दस्तीदार ने हंसते हुए कहा, "हाथ में मछली लटकाकर प्रचार? यह सुनकर ही ताज्जुब होता है। बीजेपी समझ गई है कि बंगाल के लोग उन्हें पसंद नहीं कर रहे, इसलिए अब दिखावे के लिए बंगालीपन का नाटक कर रहे हैं।"
कहां काम करेगी यह रणनीति?
दिलचस्प बात यह है कि यह 'मछली कार्ड' कोलकाता और शहरी इलाकों जैसे सिलीगुड़ी, दुर्गापुर और खड़गपुर में ज्यादा दिख रहा है। हुगली और बर्धमान जैसे ग्रामीण इलाकों के उम्मीदवारों का मानना है कि वहां सिंचाई, सड़क और फसलों की कीमत ज्यादा बड़े मुद्दे हैं, न कि खान-पान।