नई दिल्ली. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राज्यसभा में पहली बार बहुमत के बेहद करीब पहुंचती दिखाई दे रही है। पिछले 40 वर्षों में किसी भी राजनीतिक दल ने उच्च सदन में इतनी मजबूत स्थिति हासिल नहीं की थी। मनोनीत सदस्यों, निर्दलीय सांसदों और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी दलों के समर्थन के साथ भाजपा साधारण बहुमत के करीब पहुंच चुकी है, जबकि गठबंधन के स्तर पर उसका आंकड़ा दो-तिहाई बहुमत के आसपास माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह स्थिति केंद्र सरकार के लिए विधायी प्रक्रिया को और अधिक सहज बना सकती है।
12 वर्षों से चल रहा है संख्या बढ़ाने का अभियान
भाजपा ने राज्यसभा में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए पिछले लगभग 12 वर्षों से लगातार रणनीतिक प्रयास किए हैं। इस दौरान पार्टी ने विभिन्न राज्यों में अपने राजनीतिक विस्तार के साथ-साथ विपक्षी दलों के कई नेताओं को अपने साथ जोड़ने की नीति पर भी काम किया। बताया जा रहा है कि अब तक विपक्ष के 20 से अधिक सांसद अलग-अलग परिस्थितियों में भाजपा के खेमे में शामिल हो चुके हैं। हाल के घटनाक्रम में तृणमूल कांग्रेस के कुछ राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे और उपचुनाव के जरिए उनकी दोबारा वापसी को भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
दोहरी रणनीति से बढ़ाया जा रहा संख्या बल
भाजपा की रणनीति मुख्य रूप से दो स्तरों पर काम करती है। पहला, जहां किसी विपक्षी दल के पर्याप्त सांसद उपलब्ध होते हैं, वहां संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत आवश्यक दो-तिहाई संख्या पूरी कर दल के विलय की प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिससे दलबदल कानून लागू नहीं होता। दूसरा, जिन मामलों में इतनी संख्या उपलब्ध नहीं होती, वहां सांसदों के इस्तीफे के बाद होने वाले उपचुनाव के जरिए नई राजनीतिक स्थिति बनाई जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में संवैधानिक प्रावधानों का पालन करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
भाजपा शासित राज्यों का मिल रहा लाभ
राज्यसभा के उपचुनाव विधानसभा के संख्या बल के आधार पर होते हैं। ऐसे में जिन राज्यों में भाजपा या उसके सहयोगी दलों की सरकार है, वहां पार्टी को स्वाभाविक बढ़त मिलती है। वर्तमान में भाजपा 17 राज्यों में अपने दम पर सरकार चला रही है, जबकि 22 राज्यों में वह सहयोगी दलों के साथ सत्ता का हिस्सा है। इसी राजनीतिक आधार ने राज्यसभा में उसके संख्या बल को लगातार मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उपचुनावों में विधानसभा में बहुमत रखने वाली पार्टी की जीत की संभावना अधिक होती है, जिससे भाजपा को अतिरिक्त लाभ मिला है।
आगे के विधायी एजेंडे पर रहेगा असर
राज्यसभा में भाजपा की बढ़ती ताकत का असर संसद में सरकार के विधायी एजेंडे पर भी देखने को मिल सकता है। उच्च सदन में मजबूत स्थिति होने से महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में सरकार को अपेक्षाकृत कम राजनीतिक बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, संवैधानिक संशोधनों जैसे मामलों में अब भी व्यापक राजनीतिक सहमति की आवश्यकता बनी रहेगी। आने वाले समय में राज्यसभा की बदलती राजनीतिक तस्वीर केंद्र की नीति निर्माण प्रक्रिया और विपक्ष की रणनीति, दोनों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।