नई दिल्ली. साल 2011 से देश भर के नौकरशाहों के लिए अपनी अचल संपत्ति बताना अनिवार्य है। मकसद साफ था कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगे और सत्ता में बैठे लोग जनता के प्रति जवाबदेह रहें। लेकिन ताजा घोषणाओं को देखने से लगता है कि यह सुरक्षा कवच काफी ढीला पड़ चुका है। कई अफसरों ने संपत्ति का जिक्र तो कर दिया, लेकिन जरूरी ब्यौरे देने से बच निकले। नतीजा यह हुआ कि पारदर्शिता का असल मकसद अधूरा रह गया। सिस्टम की ये खामियां अब साफ नजर आने लगी हैं।
सचिव स्तर के अफसरों की घोषणाओं की पड़ताल
सचिव स्तर के कुल 131 अधिकारियों में से 102 की नवीनतम संपत्ति घोषणाएं 31 मार्च 2026 को सरकारी पोर्टल पर उपलब्ध हुईं। इंडियन एक्सप्रेस ने इन कागजातों की गहन समीक्षा की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। इन 102 अफसरों ने मिलाकर 244 स्वअर्जित संपत्तियां बताई हैं। इनमें से काफी बड़ी संख्या में संपत्तियों के बारे में बुनियादी जानकारियां ही गायब हैं। यह स्थिति पूरे सिस्टम की निगरानी व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करती है।
आकार और मूल्य के ब्यौरों की भारी कमी
घोषित 244 स्वअर्जित संपत्तियों में से 115 का क्षेत्रफल या माप ही नहीं लिखा गया। ठीक इतनी ही यानी 115 संपत्तियों का मौजूदा बाजार मूल्य भी नहीं बताया गया। कई जगह सिर्फ संपत्ति का प्रकार और शहर का नाम भर दे दिया गया, जबकि उसकी असल नाप-जोख और कीमत छुपा ली गई। ऐसे अधूरे ब्यौरों से न तो आम आदमी और न ही निगरानी एजेंसियां संपत्ति की असली तस्वीर समझ पाती हैं। पारदर्शिता का दावा कमजोर पड़ जाता है।
शून्य संपत्ति बताने वाले अफसर
समीक्षा में शामिल 102 अधिकारियों में से 10 ने साफ लिख दिया कि उनकी कोई स्वअर्जित संपत्ति नहीं है। सचिव स्तर तक पहुंचे अफसरों का यह दावा कई सवाल खड़े करता है। कई मामलों में सिर्फ पैतृक संपत्ति का जिक्र करके स्वअर्जित संपत्ति को शून्य दिखा दिया गया लगता है। ऐसे दावों की सत्यता जांचने की व्यवस्था कितनी सख्त है, यह साफ नहीं है। इससे पूरी घोषणा प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है।
पारदर्शिता बढ़ाने के लिए क्या बदलाव जरूरी हैं
मौजूदा व्यवस्था में साफ खामियां हैं जिन्हें दूर किए बिना इसका फायदा नहीं मिल सकता। संपत्ति का आकार, मौजूदा मूल्य, खरीद का साल और पैसे कहां से आए जैसे जरूरी कॉलम अनिवार्य रूप से भरवाने चाहिए। अधूरा फॉर्म स्वीकार ही न हो, ऐसी व्यवस्था डिजिटल पोर्टल पर लगानी होगी। समय-समय पर ऑडिट और सत्यापन की प्रक्रिया भी मजबूत करने की जरूरत है। तभी यह सिस्टम वाकई काम का बनेगा।
जवाबदेही और भ्रष्टाचार नियंत्रण पर असर
अधूरी घोषणाएं भ्रष्टाचार रोकने के मूल मकसद को कमजोर कर देती हैं। जब संपत्ति का आकार और मूल्य ही पता न हो तो अफसर की ज्ञात आमदनी से उसकी तुलना करना मुश्किल हो जाता है। इससे जनता का भरोसा भी टूटता है। सख्त निगरानी और बाध्यकारी नियमों के बिना यह व्यवस्था महज औपचारिकता बनकर रह जाती है। अफसरों की असल जवाबदेही तय करने के लिए घोषणा प्रणाली को और पारदर्शी तथा विवरणों से भरपूर बनाना बेहद जरूरी है।