नई दिल्ली, 1951 का साल था। तेलंगाना कम्युनिस्टों और जमींदारों के संघर्ष का अखाड़ा बना हुआ था। कोई सुनने को राजी नहीं था। मार काट मची थी। भू स्वामियों और भूमिहीनों के बीच ठनी थी, ऐसे में ही गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी ने शांति दूत बनने का प्रण लिया और बढ़ चला उस काम को करने जो भूदान यज्ञ कहलाया।
धार्मिक परिवेश में हुआ था विनोबा का जन्म
ब्राह्मण कुल में जन्मे विनोबा का परिवेश धार्मिक था। संस्कार मां और पिता से मिले तो बापू के विचारों ने दिशा तय करने में मदद की। 11 सितंबर 1895 में महाराष्ट्र के ब्राह्मण कुल में एक बच्चे का जन्म हुआ। कोलाबा के गागोदा गांव में जन्मे इस बालक को नाम दिया गया विनायक नरहरी भावे। परिजन 'विन्या' बुलाते थे लेकिन बाद में बापू ने नाम दिया विनोबा। महात्मा को पहली बार काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में सुना था। 1916 के उस ऐतिहासिक भाषण को सुन कर देश का अभिजात तबका ठिठक गया था और हजारों भारतीयों की तरह विनोबा भी गांधी के प्रशंसक और अनुयायी बन गए। उनके दिखाए मार्ग पर चलना, सीख को जीवन में अपनाना मिशन बना लिया।
1951 में मिला था भूमि का पहला दान
भूदान आंदोलन भी बापू के सर्वोदय संकल्प का एक दूसरा रूप था। श्रीचारुचंद्र भंडारी की बांग्ला कृति 'भूदान यज्ञ: के ओ केन' में संकल्प को समझाया गया है। भंडारी विनोबा के करीबी लोगों में से एक थे। उन्होंने ही लिखा है कि 18 अप्रैल 1951 का ही वो दिन था जब भूमि का पहला दान मिला। तेलंगाना के शिवरामपल्ली से भूदान यज्ञ की गंगोत्री फूटी थी। गांधी के इस परम शिष्य का मानना था कि भगवान के दिए हुए हवा, पानी और प्रकाश पर जैसे सबका अधिकार है, उसी तरह भगवान की दी हुई जमीन पर भी सबका एक-सा अधिकार है । बस इसी सिद्धांत के आधार पर भू मालिकों से भूमि लेकर भूमिहीनों को देना चाहा।
कम्युनिस्टों और जमींदारों के बीच ठन गई थी
मकसद एक ही था भूमिहीनों को आर्थिक दृष्टि से मजबूत करना, उन्हें अपने पांवों पर खड़ा करना। सवाल उठता है कि आखिर तेलंगाना ने भूदान की पटकथा कैसे लिखी, विनोबा के विचारों को मूर्त रूप देने वाले उस पहले भू स्वामी का नाम क्या था? भूदान यज्ञ में भंडारी लिखते हैं, तेलंगाना में अप्रैल 1951 में सर्वोदय सम्मेलन के लिए पहुंचना था। तेलंगाना नामक स्थान में भूमि समस्या को लेकर हिंसक आंदोलन चल रहा था। कम्युनिस्ट और जमींदारों के बीच ठन गई थी। कई भू स्वामियों से जमीन छीनकर कृषकों के बीच जमीन बांट दी गई थी। दूसरी ओर उन लोगों पर ज्यादती करके जमीन छीनी भी जा रही थी। दोनों ही पक्ष मार काट पर उतारू थे।
भूमिहीनों में बांटी 13 लाख एकड़ जमीन
तेलंगाना से होता हुआ ये भूदान बिहार, बंगाल होते हुए देश के विभिन्न राज्यों तक पहुंचा। 13 साल में इसने बड़ा रंग दिखाया। आर्थिक आजादी के इस प्रयोग में विनोबा भावे ने देश की करीब 58,741 किलोमीटर की दूरी को पैदल नापा। इस दौरान भूदान यज्ञ के तहत मिली 44 लाख एकड़ जमीन करीब 13 लाख भूमिहीन किसानों में बांटी गई। 'भूदान यज्ञ: के ओ केन’ में ही लिखते हैं कि विनोबा भावे आजीवन सेवाव्रती संन्यासी, महात्मा गांधी के बड़े अनुयायी रहे। महात्मा गांधी के ऐसे आध्यात्मिक उत्तराधिकारी थे ।
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