पांच जून 1972 को स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में संयुक्त राष्ट्र मानव पर्यावरण सम्मेलन का उद्घाटन हुआ। उस समय पर्यावरण संरक्षण न तो वैश्विक राजनीति का प्रमुख विषय था और न ही आम जनचर्चा का हिस्सा। 122 देशों की भागीदारी वाले इस ऐतिहासिक सम्मेलन ने दुनिया को पर्यावरणीय जिम्मेदारी की नई दिशा दी और इसी के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की स्थापना हुई। यह सम्मेलन राष्ट्रीय सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के लिए पर्यावरण संरक्षण संबंधी दिशानिर्देश तैयार करने का आधार बना।
विकसित और विकासशील देशों के बीच था गहरा मतभेद
सम्मेलन से पहले पर्यावरण के मुद्दे पर वैश्विक सहमति बनाना आसान नहीं था। कई पूर्व औपनिवेशिक शक्तियां इस आशंका से चिंतित थीं कि उनके पुराने उपनिवेश उनसे पर्यावरणीय क्षति के लिए जवाबदेही और मुआवजे की मांग कर सकते हैं। दूसरी ओर विकासशील देशों को डर था कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर उन पर ऐसे प्रतिबंध लगाए जाएंगे, जो उनके आर्थिक विकास और सामाजिक प्रगति को प्रभावित कर सकते हैं। इस कारण पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन का प्रश्न उस समय भी उतना ही महत्वपूर्ण था जितना आज है।
भारत ने उठाई विकास और पर्यावरण के संतुलन की आवाज
सम्मेलन में भारत की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपने संबोधन में विकसित देशों के दोहरे मानदंडों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जो देश स्वयं औद्योगिक विकास के जरिए समृद्ध हुए हैं, वही विकासशील देशों को पर्यावरण के नाम पर सीमित करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका यह दृष्टिकोण विकासशील देशों की आकांक्षाओं और पर्यावरणीय जिम्मेदारियों के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप माना गया।
हिमालय में पेड़ों को बचाने के लिए खड़ा हुआ जनआंदोलन
इसी दौर में उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय क्षेत्र में वनों की अंधाधुंध कटाई को लेकर लोगों में गहरी चिंता पैदा हो चुकी थी। 1970 की अलकनंदा बाढ़ ने यह स्पष्ट कर दिया था कि जंगलों की कटाई केवल पर्यावरण ही नहीं बल्कि मानव जीवन के लिए भी गंभीर खतरा बन सकती है। 1973 से स्थानीय लोगों ने व्यावसायिक लकड़ी कटाई के खिलाफ संगठित विरोध शुरू किया। यह विरोध 25 मार्च 1974 को ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंचा, जब चमोली-गोपेश्वर क्षेत्र के निकट हजारों पेड़ों की कटाई के लिए पहुंचे ठेकेदारों का सामना गांव की महिलाओं ने किया। महिलाओं ने पेड़ों को गले लगाकर कटाई रोक दी और यही अनोखा प्रतिरोध आगे चलकर ‘चिपको आंदोलन’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
चिपको से अप्पिको तक फैला पर्यावरण संरक्षण का संदेश
चिपको आंदोलन ने केवल हिमालयी क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि पूरे देश में पर्यावरण संरक्षण की नई चेतना पैदा की। इसके प्रभाव से कर्नाटक में ‘अप्पिको आंदोलन’ का जन्म हुआ, जहां लोगों ने पश्चिमी घाट के जंगलों को बचाने के लिए इसी प्रकार पेड़ों से लिपटकर विरोध प्रदर्शन किया। इन आंदोलनों ने यह साबित किया कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी नीतियों का विषय नहीं बल्कि समाज की सक्रिय भागीदारी से जुड़ा हुआ अभियान है। चिपको आंदोलन के प्रभाव को देखते हुए 1980 में केंद्र सरकार ने हिमालयी क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई पर 15 वर्षों का प्रतिबंध लगा दिया, जो इस जनसंघर्ष की बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।
आज भी प्रासंगिक है चिपको की सीख
जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और जैव विविधता के संकट से जूझ रही दुनिया के लिए चिपको आंदोलन आज भी प्रेरणा का स्रोत है। यह आंदोलन हमें याद दिलाता है कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। जब स्थानीय समुदाय पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी अपने हाथों में लेते हैं, तब बड़े से बड़ा परिवर्तन संभव हो सकता है। चिपको और अप्पिको की विरासत आज भी यह संदेश देती है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन ही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है।