नई दिल्ली. अलनीनो की वर्तमान स्थिति अगले वर्ष फरवरी तक प्रभावी रहने का अनुमान है। इसका सीधा असर भारतीय कृषि व्यवस्था पर पड़ रहा है। कमजोर मानसून के कारण बारिश की कमी ने पहले खरीफ फसलों को प्रभावित किया और अब रबी सीजन भी इसकी चपेट में आने लगा है। मिट्टी में नमी का स्तर तेजी से गिर रहा है जिससे बुवाई का कार्य बाधित हो सकता है। सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी की मात्रा भी घट रही है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति नहीं सुधरी तो प्रमुख रबी फसलों की उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यह स्थिति देश की खाद्य सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन गई है।
मानसून की कमी और मिट्टी की नमी का संकट
भारत में कृषि अभी भी मानसूनी बारिश पर काफी हद तक निर्भर है। इस वर्ष मानसूनी बारिश सामान्य से तेरह प्रतिशत कम दर्ज की गई है। वर्षा का वितरण भी असमान रहा है। कई क्षेत्रों में बारिश की कमी चालीस से साठ प्रतिशत तक पहुंच गई है। इससे मिट्टी में आवश्यक नमी का स्तर काफी नीचे चला गया है। खरीफ फसलों के उत्पादन पर पहले ही दबाव बढ़ चुका है। अब यही कमी रबी फसलों की तैयारी को प्रभावित कर रही है। जलाशयों में पानी का स्तर गिरने से सिंचाई की उपलब्धता और सीमित हो गई है। लंबे समय तक नमी की कमी मिट्टी की उर्वरता पर भी असर डाल सकती है।
दलहन और तिलहन फसलों पर दिखने लगा असर
महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में कम बारिश का सीधा प्रभाव दलहन एवं तिलहन की खेती पर दिखाई देने लगा है। इन क्षेत्रों में जलाशयों और मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं होने से रबी की बुवाई प्रभावित होने की संभावना है। महाराष्ट्र में दो सौ पैंसठ तालुकों में सूखे की घोषणा भी की जा चुकी है। किसान इन क्षेत्रों में चना और सरसों जैसी फसलों की बुवाई को लेकर चिंतित हैं। कम नमी वाले क्षेत्रों में पैदावार घटने का खतरा बढ़ गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अक्टूबर-नवंबर में भी पर्याप्त नमी नहीं मिली तो रकबा घट सकता है। यह स्थिति बाजार में दलहन और तिलहन की उपलब्धता को प्रभावित कर सकती है।
रबी बुवाई का समय और किसानों की दुविधा
आम तौर पर किसान खरीफ फसलों की कटाई के बाद अक्टूबर-नवंबर में रबी फसलों की बुवाई करते हैं। यह समय मिट्टी की नमी और सिंचाई जल की उपलब्धता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्तमान में नमी की कमी के कारण कई किसान बुवाई टालने या रकबा घटाने पर विचार कर रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि नमी कम होने पर बुवाई का निर्णय प्रभावित होगा। गेहूं जैसी फसल के लिए सर्दियों की अनुकूल परिस्थितियां और पर्याप्त सिंचाई आवश्यक होती है। यदि ये स्थितियां नहीं बनीं तो पैदावार पर असर पड़ना तय है। किसान अभी इंतजार की मुद्रा में हैं कि आगे बारिश या सिंचाई की व्यवस्था कैसे होती है।
गेहूं चना और सरसों पर मंडराया खतरा
गेहूं की फसल के लिए पर्याप्त सिंचाई और अनुकूल तापमान जरूरी है। नमी की कमी से इसकी बुवाई और बाद की वृद्धि दोनों प्रभावित हो सकती हैं। चना और सरसों जैसी फसलें अपेक्षाकृत कम पानी में भी उगाई जा सकती हैं लेकिन लंबे समय तक नमी की कमी से इनकी पैदावार भी घट जाती है। इन प्रमुख फसलों की उत्पादकता में गिरावट आने पर बाजार में आपूर्ति प्रभावित होगी। इससे खाद्य मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ने की आशंका है। किसान इन फसलों की बुवाई को लेकर सतर्क हो गए हैं क्योंकि जोखिम बढ़ गया है। कृषि विभागों द्वारा वैकल्पिक फसलों या कम पानी वाली किस्मों पर जोर दिया जा रहा है।
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
कृषि संकट के बीच सरकार के सामने खाद्य महंगाई को नियंत्रित रखने और किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाने की दोहरी चुनौती है। यदि रबी फसलों का उत्पादन प्रभावित होता है तो बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं। वहीं किसानों को नुकसान से बचाने के लिए राहत उपायों की जरूरत पड़ेगी। कम बारिश वाले राज्यों में सूखा राहत और सिंचाई सुविधाओं का विस्तार आवश्यक हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते जल प्रबंधन और वैकल्पिक सिंचाई स्रोतों पर ध्यान देना होगा। सरकार को किसानों के हित और उपभोक्ताओं की जरूरत के बीच संतुलन बनाना होगा। यह स्थिति आने वाले महीनों में नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करेगी।