नई दिल्ली - टमाटर की खेती करने वाले किसानों को इन दिनों दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ मंडियों में टमाटर की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की जा रही है, तो दूसरी ओर सूखे जैसी परिस्थितियां खेती को प्रभावित कर रही हैं। महाराष्ट्र की प्रमुख टमाटर मंडियों में शामिल पिंपलगांव एपीएमसी में पिछले एक सप्ताह के दौरान थोक कीमतों में भारी कमी आई है। अतिरिक्त आपूर्ति और कमजोर मांग को इसकी प्रमुख वजह बताया जा रहा है। इसका असर किसानों की कमाई पर पड़ रहा है, जबकि खुदरा बाजार में भी टमाटर के दाम पहले के मुकाबले कम हुए हैं।
एक सप्ताह में 65 फीसदी तक गिर गए थोक भाव
रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र की पिंपलगांव एपीएमसी में टमाटर की कीमतें एक सप्ताह के भीतर करीब 65 प्रतिशत तक गिर गईं। रिपोर्ट में बताया गया कि भाव घटकर 111 रुपये प्रति 20 किलोग्राम रह गए हैं। यह गिरावट टमाटर उत्पादक किसानों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
जब मंडियों में किसी कृषि उपज की आवक बढ़ जाती है और उसके मुकाबले खरीदारों की मांग कमजोर रहती है, तो कीमतों पर दबाव पड़ता है। टमाटर के मामले में भी अतिरिक्त आपूर्ति और कमजोर मांग को गिरते भाव की वजह बताया गया है।
किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। खेती में बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और परिवहन पर होने वाले खर्च के बीच कम कीमत पर फसल बेचने से उनकी आमदनी प्रभावित हो सकती है।
नासिक के खुदरा बाजार में भी सस्ता हुआ टमाटर
थोक मंडियों में कीमतें गिरने का असर खुदरा बाजार में भी दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, नासिक में सोमवार को टमाटर करीब 20 रुपये प्रति किलोग्राम बिक रहा था। इससे एक सप्ताह पहले इसका भाव लगभग 40 रुपये प्रति किलोग्राम था।
इस तरह खुदरा कीमत में करीब 50 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। आम उपभोक्ताओं के लिए यह राहत की खबर हो सकती है, क्योंकि कम कीमत पर टमाटर उपलब्ध होने से रसोई का खर्च कुछ कम हो सकता है।
हालांकि, उपभोक्ताओं को मिलने वाली यह राहत किसानों के लिए चिंता का कारण बन सकती है। जब खुदरा बाजार में कीमतें गिरती हैं, तो उसका असर अक्सर मंडियों में खरीदे जाने वाले टमाटर के भाव पर भी पड़ता है। इसके बावजूद खुदरा और थोक कीमतों के बीच परिवहन, भंडारण और अन्य खर्चों के कारण अंतर बना रहता है।
अतिरिक्त आपूर्ति बनी कीमतों में गिरावट की वजह
टमाटर की कीमतों में तेजी और गिरावट का सीधा संबंध बाजार में उपलब्ध फसल और उसकी मांग से होता है। यदि मंडियों में बड़ी मात्रा में टमाटर पहुंचता है, लेकिन खरीदार उसी अनुपात में खरीदारी नहीं करते, तो उत्पादकों को कम भाव पर फसल बेचनी पड़ सकती है।
टमाटर जल्दी खराब होने वाली सब्जी है। इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखना आसान नहीं होता। ऐसे में किसान कई बार कीमतें बढ़ने का इंतजार करने के बजाय उपलब्ध भाव पर ही उपज बेचने को मजबूर हो जाते हैं। इस स्थिति में बाजार तक समय पर परिवहन, उचित भंडारण सुविधाएं और बिक्री के बेहतर विकल्प किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
सूखे की स्थिति ने बढ़ाई किसानों की चिंता
कीमतों में गिरावट के साथ सूखे जैसी परिस्थितियां भी किसानों की मुश्किलें बढ़ा रही हैं। टमाटर की फसल को पर्याप्त पानी की जरूरत होती है। सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता कम होने पर उत्पादन और फसल की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
ऐसे में किसानों के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो जाती है। एक ओर खेती की लागत और पानी की उपलब्धता को लेकर दबाव रहता है, वहीं दूसरी ओर तैयार फसल बेचने पर अपेक्षित कीमत नहीं मिलती। हालांकि, सूखे की स्थिति का वास्तविक प्रभाव संबंधित क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता, सिंचाई व्यवस्था और मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
किसानों और उपभोक्ताओं पर क्या होगा असर?
टमाटर की कीमतों में आई गिरावट का असर किसानों और उपभोक्ताओं पर अलग-अलग तरीके से पड़ता है। उपभोक्ताओं को कम कीमत पर सब्जी मिल सकती है, लेकिन किसानों की आय घटने का जोखिम बढ़ जाता है। यदि बाजार में लंबे समय तक भाव कम बने रहते हैं, तो खेती की लागत निकालना भी मुश्किल हो सकता है।
फिलहाल पिंपलगांव मंडी में कीमतों में आई तेज गिरावट ने टमाटर उत्पादकों की चिंता बढ़ा दी है। आगे बाजार में आवक, मांग और मौसम की स्थिति यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगी कि कीमतों में सुधार होता है या किसानों को कम भाव की चुनौती का सामना करना पड़ता है।