मैनपुरी - देशभर में विजयादशमी के दिन रावण दहन के साथ बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में यह परंपरा कुछ अलग है। यहां रामलीला में रावण के वध और उसके पुतले के दहन की परंपरा विजयादशमी के बजाय अगले दिन एकादशी को निभाई जाती है। करीब 200 साल से चली आ रही यह परंपरा महाराजा तेज सिंह जूदेव की स्मृति और उनसे जुड़ी ऐतिहासिक मान्यताओं से संबंधित है। आज भी स्थानीय लोग इस परंपरा को श्रद्धा और उत्साह के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।
महाराजा तेज सिंह जूदेव से जुड़ी है परंपरा
मैनपुरी की रामलीला की खासियत बताते हुए रामलीला समिति के वरिष्ठ उपाध्यक्ष वीर सिंह भदौरिया ने बताया कि महाराजा तेज सिंह जूदेव के सम्मान में विजयादशमी के अगले दिन रावण दहन की परंपरा शुरू हुई थी। समय के साथ यह स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन गई।
स्थानीय लोग आज भी इस परंपरा का पालन करते हैं। इसका उद्देश्य केवल धार्मिक आयोजन करना ही नहीं, बल्कि शहर के इतिहास और पूर्वजों से जुड़ी स्मृतियों को भी जीवित रखना है। इसी कारण मैनपुरी की रामलीला आसपास के क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान रखती है।
श्राद्ध पक्ष में शुरू हो जाता है रामलीला मंचन
मैनपुरी के रामलीला मैदान में रामलीला का मंचन श्राद्ध पर्व के दौरान ही शुरू हो जाता है। यहां कार्यक्रम तिथियों के अनुसार आगे बढ़ता है और अलग-अलग प्रसंगों का मंचन किया जाता है। रामायण के प्रमुख घटनाक्रमों को प्रस्तुत करते हुए अंत में भगवान श्रीराम द्वारा रावण के वध का दृश्य दिखाया जाता है।
समिति के मुताबिक, पहले रामलीला का मंचन दिन के समय किया जाता था, लेकिन अब इसे रात में आयोजित किया जाता है। इस बदलाव के बावजूद आयोजन की पारंपरिक पहचान और रावण दहन की विशेष तिथि कायम है।
राम-रावण युद्ध के मंचन में शामिल होते हैं हनुमान स्वरूप युवा
रामलीला के दौरान भगवान श्रीराम और रावण के बीच युद्ध का मंचन मुख्य आकर्षण रहता है। इस आयोजन में पंजाबी समाज के युवा हनुमान स्वरूप में शामिल होते हैं। उनकी भागीदारी रामलीला की परंपरा को सामाजिक सहभागिता से जोड़ती है। धार्मिक प्रसंगों के मंचन के दौरान बड़ी संख्या में लोग कार्यक्रम देखने पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों के लिए यह आयोजन आस्था के साथ-साथ सामुदायिक मेल-जोल का अवसर भी है।
आसपास के कस्बों में अलग-अलग तारीखों पर रावण दहन
मैनपुरी जिले में केवल मुख्यालय ही नहीं, बल्कि आसपास के कस्बों में भी रावण दहन की तिथियां अलग-अलग रहती हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, करहल में विजयादशमी के दिन रावण दहन किया जाता है। वहीं बेवर, भोगांव और कुरावली में आयोजन अलग-अलग तारीखों पर होता है।
इस वर्ष के कार्यक्रम से संबंधित जानकारी में बेवर में 31 अक्टूबर, भोगांव में 2 नवंबर और कुरावली में 25 अक्टूबर के बाद रावण दहन होने का उल्लेख किया गया है। इन तिथियों को प्रकाशित करने से पहले स्थानीय रामलीला समितियों से पुष्टि करना जरूरी है, ताकि श्रद्धालुओं को सही कार्यक्रम की जानकारी मिल सके।
शोभायात्रा के जरिए नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ने की कोशिश
महाराजा तेज सिंह जूदेव की स्मृति को बनाए रखने के लिए क्षत्रिय समाज की ओर से दशहरे पर उनकी शोभायात्रा भी निकाली जाती है। इस आयोजन के माध्यम से नई पीढ़ी को मैनपुरी के इतिहास और यहां की पुरानी परंपराओं से परिचित कराने का प्रयास किया जाता है।
स्थानीय परंपराएं किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को खास पहचान देती हैं। मैनपुरी में एकादशी को रावण दहन करना भी ऐसी ही परंपरा है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है। जहां देश के अधिकांश हिस्सों में विजयादशमी पर रावण दहन किया जाता है, वहीं मैनपुरी की यह विशिष्ट परंपरा धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक स्मृति और स्थानीय संस्कृति के अनूठे मेल को दर्शाती है।