नई दिल्ली - दिल्ली हाईकोर्ट में बुधवार को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान अदालत ने प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका और बैरिकेड तोड़ने जैसी गतिविधियों पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि जब प्रदर्शनकारी खुद सबसे आगे रहते हैं और प्रतिबंधित स्थान पर पहुंचकर बैरिकेड तोड़ते हैं, तो दूसरे लोगों के भी ऐसा करने की आशंका बढ़ जाती है। इससे स्थिति को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।
बैरिकेड तोड़ने पर अदालत ने जताई चिंता
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रदर्शन के दौरान अनुशासन और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी को लेकर टिप्पणी की। अदालत ने याचिकाकर्ताओं की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि वे इस समय प्रदर्शन में सबसे आगे हैं। ऐसे में यदि वे बैरिकेड तोड़ने जैसी गतिविधियों में शामिल होते हैं, तो वहां मौजूद दूसरे लोग भी उनका अनुसरण कर सकते हैं।
कोर्ट के अनुसार, शुरुआत में कुछ लोगों की ओर से उठाया गया कदम आगे चलकर बड़े समूह के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। अदालत ने आशंका जताई कि यदि 10 से 20 अन्य लोग भी ऐसा करने लगें, तो उन पर याचिकाकर्ताओं का नियंत्रण नहीं रहेगा। ऐसी स्थिति में कानून-व्यवस्था बनाए रखने में मुश्किलें पैदा हो सकती हैं।
जंतर-मंतर जाने की अनुमति पर उठाया सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने आशुतोष रांका और सौरव दास से यह भी सवाल किया कि जब जंतर-मंतर जाने की अनुमति नहीं थी, तो वे वहां गए ही क्यों। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी प्रदर्शन के दौरान निर्धारित नियमों और प्रशासन की ओर से तय शर्तों का पालन करना जरूरी है। अदालत ने कथित तौर पर बिना अनुमति वहां पहुंचने और बैरिकेड तोड़ने की गतिविधि को लेकर सवाल उठाए। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूछा कि आखिर वहां क्या हो रहा था और प्रदर्शनकारियों ने ऐसा कदम क्यों उठाया।
दूसरे देशों में हुए प्रदर्शनों का भी किया जिक्र
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान दूसरे देशों में हुए प्रदर्शनों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार आंदोलन की शुरुआत शांतिपूर्ण तरीके से होती है, लेकिन बाद में हालात बदल जाते हैं। अदालत की टिप्पणी का मुख्य संदर्भ यह था कि किसी भी प्रदर्शन के दौरान परिस्थितियां तेजी से बिगड़ सकती हैं और भीड़ को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि यदि प्रदर्शनकारी नियमों का उल्लंघन करते हैं, तो स्थिति केवल कुछ लोगों तक सीमित नहीं रहती। दूसरे लोग भी उसी तरह की गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं, जिससे कानून-व्यवस्था प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है।
वकील से भी अदालत ने पूछे सवाल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील चिमिनी से भी अदालत ने सवाल किए। कोर्ट ने बैरिकेड तोड़ने और वहां पहुंचने की अनुमति से जुड़े मुद्दों पर स्पष्टीकरण मांगा। अदालत की टिप्पणियों से स्पष्ट हुआ कि सुनवाई में प्रदर्शन के तरीके, अनुमति की शर्तों और संभावित परिणामों पर विशेष ध्यान दिया गया। हालांकि, अदालत की मौखिक टिप्पणियों और अंतिम न्यायिक आदेश के बीच अंतर होता है। मामले में आगे की कानूनी स्थिति जानने के लिए कोर्ट के लिखित आदेश और सुनवाई के विस्तृत रिकॉर्ड को देखना महत्वपूर्ण होगा।
कानून-व्यवस्था और प्रदर्शन के अधिकार पर बहस
यह सुनवाई ऐसे समय में हुई है, जब सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान अनुमति, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े सवाल अहम बने हुए हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रदर्शनकारियों को लागू नियमों और प्रशासन की वैध शर्तों का पालन भी करना होता है।
दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी का केंद्र यह था कि बैरिकेड तोड़ने जैसी गतिविधियां भीड़ के व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं और स्थिति बिगड़ने का कारण बन सकती हैं। अब इस मामले में आगे की कार्यवाही और अदालत के आदेश पर नजर रहेगी।