जैसलमेर. राजस्थान के जैसलमेर जिले के रामगढ़ क्षेत्र में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के महत्वपूर्ण आवास के पास प्रस्तावित चूना पत्थर खनन परियोजना को केंद्र से फिलहाल पर्यावरणीय मंजूरी नहीं मिली है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से जुड़ी विशेषज्ञ समिति ने परियोजना की मंजूरी पर निर्णय टाल दिया है। समिति ने प्रस्तावित खनन योजना में कई महत्वपूर्ण पहलुओं को स्पष्ट करने और उसे स्वीकृत उत्पादन क्षमता के अनुरूप संशोधित करने को कहा है। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब देश में इस अत्यंत संकटग्रस्त पक्षी के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है।
देश में करीब 130 ग्रेट इंडियन बस्टर्ड शेष
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड भारत की सबसे गंभीर रूप से संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियों में शामिल है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार देश के जंगल और खुले प्राकृतिक क्षेत्रों में अब इसकी संख्या करीब 130 के आसपास रह गई है। राजस्थान का मरुस्थलीय क्षेत्र इस प्रजाति के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवासों में माना जाता है। जैसलमेर के रामगढ़ सहित पश्चिमी राजस्थान के विस्तृत घासभूमि और शुष्क क्षेत्र इसके अस्तित्व के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में इसके आवास के आसपास किसी भी बड़े औद्योगिक या खनन गतिविधि को पर्यावरणीय और वन्यजीव सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यधिक सावधानी के साथ देखना आवश्यक है।
खनन योजना में संशोधन का निर्देश
विशेषज्ञ समिति ने डेलमिया भारत ग्रीन विजन लिमिटेड की प्रस्तावित चूना पत्थर खदान से संबंधित खनन योजना को संशोधित करने को कहा है। समिति के अनुसार योजना को स्वीकृत उत्पादन क्षमता के अनुरूप बनाया जाना चाहिए, ताकि प्रस्तावित गतिविधियों का वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव स्पष्ट रूप से आंका जा सके। उत्पादन क्षमता और खनन गतिविधियों में संतुलन बनाए रखना पर्यावरणीय आकलन की महत्वपूर्ण शर्तों में शामिल है। समिति द्वारा संशोधन मांगने का उद्देश्य परियोजना की वास्तविक क्षमता, संभावित प्रभाव और उससे जुड़े सुरक्षा उपायों का अधिक स्पष्ट मूल्यांकन करना माना जा रहा है।
विस्फोट से पाइपलाइनों की सुरक्षा पर चिंता
समिति ने खदान में प्रस्तावित विस्फोट गतिविधियों से आसपास मौजूद गैस और जल पाइपलाइनों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीरता दिखाई है। खनन के दौरान विस्फोट से उत्पन्न कंपन और अन्य प्रभावों से भूमिगत अथवा सतही पाइपलाइन ढांचे को नुकसान पहुंचने की आशंका हो सकती है। इसलिए समिति ने ऐसी विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने को कहा है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि खनन गतिविधियों का इन महत्वपूर्ण अवसंरचनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले सुरक्षा मानकों और निगरानी व्यवस्था को स्पष्ट करना इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा होगा।
भारतीय वन्यजीव संस्थान की सिफारिशें होंगी महत्वपूर्ण
विशेषज्ञ समिति ने यह भी स्पष्ट किया है कि भारतीय वन्यजीव संस्थान की ओर से दी गई सिफारिशों का पालन किया जाना चाहिए। ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसे अत्यंत संकटग्रस्त पक्षी के मामले में उसके आवास, प्रजनन क्षेत्र, आवाजाही और भोजन क्षेत्र पर परियोजना के संभावित प्रभावों का आकलन विशेष महत्व रखता है। इसलिए केवल खनन गतिविधि के प्रत्यक्ष प्रभाव ही नहीं, बल्कि उससे पैदा होने वाले शोर, कंपन, यातायात और आवासीय क्षेत्र में संभावित बदलाव को भी ध्यान में रखना होगा। वन्यजीव विशेषज्ञों की सिफारिशों को परियोजना की आगे की प्रक्रिया में शामिल करना संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
विकास और संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती
रामगढ़ क्षेत्र का मामला यह दिखाता है कि खनिज संसाधनों के दोहन और दुर्लभ वन्यजीवों के संरक्षण के बीच संतुलन कायम करना कितना जटिल है। चूना पत्थर खनन से औद्योगिक गतिविधियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिल सकता है, लेकिन यदि परियोजना किसी संकटग्रस्त प्रजाति के महत्वपूर्ण आवास के निकट है तो उसके पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन अधिक कठोर तरीके से करना आवश्यक हो जाता है। केंद्र द्वारा मंजूरी टालना इसी सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण का संकेत है। अब संशोधित खनन योजना, पाइपलाइन सुरक्षा की कार्ययोजना और वन्यजीव संरक्षण संबंधी सिफारिशों के अनुपालन के आधार पर परियोजना की अगली स्थिति तय होगी।