नई दिल्ली. भारत तेजी से बढ़ती बिजली की मांग और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती को देखते हुए परमाणु ऊर्जा क्षमता के विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सरकार ने 2047 तक देश की परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 गीगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है, जिसके लिए उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ स्वदेशी तकनीक और ईंधन चक्र को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। वर्तमान में देश में 24 परमाणु ऊर्जा संयंत्र संचालित हैं, जिनकी कुल स्थापित क्षमता 8.78 गीगावाट है। इसके अलावा करीब 7.5 गीगावाट संयुक्त क्षमता वाले 9 परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का निर्माण चल रहा है। यदि प्रस्तावित परियोजनाएं समय पर पूरी होती हैं, तो आने वाले वर्षों में परमाणु बिजली भारत के ऊर्जा मिश्रण में पहले की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
100 गीगावाट के लक्ष्य के लिए परियोजनाओं का विस्तार
2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता हासिल करने के लिए केवल मौजूदा संयंत्रों का विस्तार पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि बड़े पैमाने पर नए रिएक्टरों की स्थापना करनी होगी। सरकार ने 10 स्वदेशी प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर यानी PHWR स्थापित करने को मंजूरी दी है। इसके अलावा 500 मेगावाट क्षमता वाले 2 फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों के लिए प्रारंभिक परियोजना गतिविधियों को भी मंजूरी दी गई है। इन परियोजनाओं का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि भारत अपनी परमाणु ऊर्जा व्यवस्था को केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि ईंधन संसाधनों के बेहतर उपयोग और दीर्घकालिक तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में भी आगे बढ़ना चाहता है। नई क्षमता जुड़ने के साथ देश के ऊर्जा तंत्र को एक ऐसा स्थिर स्रोत मिल सकता है जो मौसम पर निर्भर हुए बिना लगातार बिजली उपलब्ध करा सके।
स्वदेशी तकनीक बनी परमाणु कार्यक्रम की आधारशिला
भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम लंबे समय से स्वदेशी तकनीकी क्षमता विकसित करने की रणनीति पर आधारित रहा है। देश ने सीमित यूरेनियम संसाधनों और विशाल थोरियम भंडार को ध्यान में रखते हुए 3 चरणों वाला परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम विकसित किया। इसका उद्देश्य उपलब्ध परमाणु ईंधन संसाधनों का अधिकतम उपयोग करते हुए धीरे-धीरे थोरियम आधारित ऊर्जा उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ना है। इस रणनीति में पहले चरण में प्राकृतिक यूरेनियम आधारित रिएक्टरों से बिजली उत्पादन, दूसरे चरण में फास्ट ब्रीडर तकनीक के जरिए ईंधन संसाधनों का अधिक प्रभावी इस्तेमाल और आगे चलकर थोरियम आधारित ईंधन चक्र विकसित करने की परिकल्पना की गई है। यह लंबी अवधि की रणनीति भारत को परमाणु ईंधन के मामले में अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जाती है।
थोरियम भंडार से जुड़ी भारत की दीर्घकालिक योजना
भारत के पास थोरियम के पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं और यही कारण है कि देश के परमाणु कार्यक्रम में थोरियम को भविष्य के महत्वपूर्ण ऊर्जा संसाधन के रूप में देखा गया है। हालांकि थोरियम को सीधे वर्तमान वाणिज्यिक रिएक्टरों में बड़े पैमाने पर ईंधन के रूप में इस्तेमाल करना तकनीकी रूप से जटिल प्रक्रिया है। इसके लिए एक विकसित ईंधन चक्र और आवश्यक रिएक्टर तकनीक की जरूरत होती है। भारत का 3 चरणों वाला कार्यक्रम इसी चुनौती का समाधान खोजने के लिए तैयार किया गया था। थोरियम आधारित ऊर्जा व्यवस्था को सफलतापूर्वक विकसित करने में समय लग सकता है, लेकिन इसके दीर्घकालिक लाभ को देखते हुए भारत ने इस क्षेत्र में अनुसंधान और स्वदेशी तकनीकी क्षमता निर्माण जारी रखा है। ऊर्जा संसाधनों की सीमाओं और बढ़ती बिजली मांग के बीच यह रणनीति भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।
रेडियोधर्मी कचरे के सुरक्षित प्रबंधन पर जोर
परमाणु ऊर्जा के विस्तार के साथ रेडियोधर्मी कचरे का सुरक्षित प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण विषय है। भारत ने उच्च स्तरीय रेडियोधर्मी अपशिष्ट के प्रबंधन के लिए वाइट्रिफिकेशन तकनीक विकसित की है। इस प्रक्रिया में रेडियोधर्मी अपशिष्ट को कांच जैसी स्थिर संरचना में बदला जाता है, जिससे उसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने, परिवहन करने और निर्धारित स्थान पर निपटाने में सुविधा होती है। परमाणु ऊर्जा के व्यापक विस्तार के साथ ईंधन चक्र के हर चरण की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक होगा। इसमें रिएक्टर संचालन, प्रयुक्त ईंधन का प्रबंधन, रेडियोधर्मी अपशिष्ट का उपचार और दीर्घकालिक भंडारण सभी शामिल हैं। भारत की स्वदेशी क्षमता इस दिशा में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को तकनीकी रूप से अधिक व्यापक और आत्मनिर्भर बनाने में मदद करती है।
कोयले और जीवाश्म ईंधनों पर दबाव होगा कम
भारत की बिजली व्यवस्था में कोयले की भूमिका फिलहाल बेहद महत्वपूर्ण है और आने वाले समय में बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करना बड़ी चुनौती बनी रहेगी। परमाणु ऊर्जा इस चुनौती का एक हिस्सा इसलिए हल कर सकती है क्योंकि परमाणु संयंत्र मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर हुए बिना लगातार बिजली पैदा करने में सक्षम होते हैं। सौर और पवन ऊर्जा के तेजी से विस्तार के बीच परमाणु बिजली एक स्थिर कम-कार्बन स्रोत के रूप में ऊर्जा तंत्र को संतुलन देने में भूमिका निभा सकती है। इससे बिजली उत्पादन में कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधनों पर अतिरिक्त दबाव कम करने की संभावना बनेगी। हालांकि परमाणु ऊर्जा का विस्तार नवीकरणीय ऊर्जा के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि विभिन्न ऊर्जा स्रोतों को एक साथ जोड़कर अधिक विश्वसनीय और कम-कार्बन बिजली व्यवस्था तैयार करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
आयातित ईंधनों पर निर्भरता घटाने की कोशिश
ऊर्जा सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण पहलू आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना भी है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल, गैस और कोयले की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर ऊर्जा लागत और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से लंबे समय तक स्थिर बिजली उत्पादन की क्षमता भारत को ऊर्जा स्रोतों में विविधता प्रदान कर सकती है। यदि परमाणु क्षमता में बड़े पैमाने पर वृद्धि होती है, तो बिजली क्षेत्र में जीवाश्म ईंधनों की अतिरिक्त आवश्यकता को सीमित करने में मदद मिल सकती है। इसके साथ ही घरेलू परमाणु तकनीक और ईंधन चक्र विकसित होने से देश की ऊर्जा व्यवस्था बाहरी आपूर्ति बाधाओं के प्रति अधिक लचीली हो सकती है। हालांकि इसके लिए परियोजनाओं की लागत, निर्माण अवधि, सुरक्षा मानकों और ईंधन उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियों का प्रभावी समाधान जरूरी होगा।
जलवायु लक्ष्यों के साथ ऊर्जा जरूरतों का संतुलन
भारत के सामने एक साथ 2 बड़ी चुनौतियां हैं—तेजी से बढ़ती बिजली की मांग पूरी करना और उत्सर्जन की तीव्रता कम करना। परमाणु ऊर्जा इस संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है क्योंकि इससे परिचालन के दौरान अपेक्षाकृत कम कार्बन उत्सर्जन के साथ लगातार बिजली उत्पादन संभव है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए सौर, पवन, जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा जैसे विभिन्न स्रोतों का विस्तार कर रहा है, जबकि कोयला अभी भी बिजली व्यवस्था का प्रमुख आधार बना हुआ है। ऐसे में परमाणु क्षमता में वृद्धि से कम-कार्बन बिजली की हिस्सेदारी बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। यह रणनीति भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं और ऊर्जा सुरक्षा को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश का हिस्सा है।
2047 का लक्ष्य आसान नहीं, लेकिन रणनीतिक रूप से अहम
2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता का लक्ष्य मौजूदा 8.78 गीगावाट क्षमता की तुलना में बहुत बड़ा विस्तार होगा। इसके लिए रिएक्टर निर्माण की गति बढ़ाने, घरेलू विनिर्माण क्षमता मजबूत करने, ईंधन की दीर्घकालिक उपलब्धता सुनिश्चित करने और परमाणु सुरक्षा के उच्चतम मानकों को बनाए रखने की आवश्यकता होगी। साथ ही बड़ी परियोजनाओं के लिए भारी पूंजी निवेश, प्रशिक्षित मानव संसाधन और कुशल नियामकीय व्यवस्था भी जरूरी होगी। यदि इन चुनौतियों का समाधान योजनाबद्ध तरीके से किया जाता है, तो परमाणु ऊर्जा भारत की भविष्य की बिजली व्यवस्था में महत्वपूर्ण आधारभूत भूमिका निभा सकती है। 100 गीगावाट का लक्ष्य केवल क्षमता विस्तार का आंकड़ा नहीं है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, स्वदेशी तकनीक, कम-कार्बन विकास और 2047 के दीर्घकालिक राष्ट्रीय विजन को एक साथ जोड़ने वाली रणनीति के रूप में देखा जा सकता है।