दिल्ली. इस वर्ष जून का महीना देश के लिए असामान्य रूप से शुष्क साबित हुआ है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के अनुसार जून में देशभर में औसतन केवल 92.2 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जबकि इस अवधि में सामान्य औसत वर्षा 157.7 मिलीमीटर मानी जाती है। इस प्रकार देश में लगभग 42 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई है, जो पिछले एक सौ वर्षों में जून के महीने की तीसरी सबसे बड़ी कमी मानी जा रही है। इससे पहले वर्ष 2009 और 2014 में ही जून के दौरान वर्षा 100 मिलीमीटर से नीचे दर्ज की गई थी। इस बार की स्थिति ने मौसम वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों दोनों की चिंताओं को बढ़ा दिया है क्योंकि मानसून का शुरुआती प्रदर्शन पूरे वर्ष की कृषि और जल उपलब्धता की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अल नीनो का बढ़ता प्रभाव बना सबसे बड़ा कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार मानसून की कमजोर शुरुआत के पीछे अल नीनो की सक्रियता प्रमुख कारणों में शामिल है। अल नीनो एक वैश्विक जलवायु प्रणाली है, जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का सतही जल सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसके कारण वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण में परिवर्तन आता है और भारत सहित अनेक देशों के वर्षा चक्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस बार भारतीय महासागर द्विध्रुवीय प्रणाली भी मानसून को विशेष समर्थन नहीं दे रही है, जिससे अल नीनो का प्रभाव और अधिक स्पष्ट दिखाई दे रहा है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले सप्ताहों में इसकी तीव्रता और बढ़ती है तो मानसून के शेष सीजन पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
खेती, जलाशयों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बढ़ा दबाव
कम वर्षा का सबसे सीधा प्रभाव कृषि क्षेत्र पर दिखाई देने लगा है। अनेक राज्यों में खरीफ फसलों की बुवाई निर्धारित समय पर पूरी नहीं हो सकी है क्योंकि खेतों में पर्याप्त नमी उपलब्ध नहीं है। वर्षा आधारित कृषि वाले क्षेत्रों में किसानों की चिंता लगातार बढ़ रही है। इसके साथ ही जलाशयों में जल संग्रहण की गति भी सामान्य से धीमी बनी हुई है, जिससे सिंचाई, पेयजल और विद्युत उत्पादन पर भी भविष्य में दबाव बढ़ सकता है। यदि जुलाई और अगस्त में वर्षा सामान्य नहीं रहती तो खाद्यान्न उत्पादन, ग्रामीण आय तथा समग्र आर्थिक गतिविधियों पर भी इसका व्यापक असर देखने को मिल सकता है।
देश के सभी हिस्सों में बारिश की बड़ी कमी दर्ज
इस बार मानसून की कमजोरी केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही है। मध्य भारत में जून के दौरान लगभग 54 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई, जो सबसे अधिक है। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 41 प्रतिशत, उत्तर-पश्चिम भारत में लगभग 30 प्रतिशत तथा दक्षिण भारत में भी सामान्य से लगभग 28 प्रतिशत कम वर्षा हुई है। यह स्थिति इस बात का संकेत देती है कि मानसून का शुरुआती चरण पूरे देश में अपेक्षाकृत कमजोर रहा है। इसी कारण अनेक राज्यों में भीषण गर्मी और उमस का दौर लंबा खिंच गया तथा तापमान सामान्य से अधिक बना रहा।
जुलाई से राहत की उम्मीद, मौसम विभाग ने जताया भरोसा
हालांकि मौसम वैज्ञानिकों ने आगामी जुलाई महीने के लिए अपेक्षाकृत सकारात्मक संकेत दिए हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग का अनुमान है कि जुलाई के पहले सप्ताह से मध्य भारत सहित देश के अधिकांश हिस्सों में मानसून दोबारा सक्रिय हो सकता है और व्यापक वर्षा दर्ज होने की संभावना है। यदि ऐसा होता है तो जून की कमी की कुछ भरपाई संभव हो सकेगी तथा किसानों को बुवाई कार्य तेज करने का अवसर मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि जुलाई और अगस्त का प्रदर्शन इस वर्ष के मानसून की वास्तविक तस्वीर तय करेगा और इसी आधार पर कृषि उत्पादन, जल उपलब्धता तथा आर्थिक गतिविधियों की दिशा भी निर्धारित होगी।
'सुपर अल नीनो' की आशंका पर वैश्विक वैज्ञानिकों की नजर
अंतरराष्ट्रीय जलवायु संस्थानों ने भी संकेत दिए हैं कि प्रशांत महासागर में समुद्री सतह का तापमान लगातार बढ़ रहा है और अल नीनो मध्यम से मजबूत अवस्था की ओर बढ़ सकता है। यदि यह स्थिति 'सुपर अल नीनो' के स्तर तक पहुंचती है तो इसका प्रभाव केवल भारत ही नहीं बल्कि एशिया, अफ्रीका और अमेरिका के कई देशों के मौसम पर भी दिखाई देगा। भारत के लिए इसका अर्थ कमजोर मानसून, अधिक तापमान, कृषि उत्पादन में गिरावट तथा जल संकट की आशंका के रूप में सामने आ सकता है। यही कारण है कि मौसम वैज्ञानिक आने वाले सप्ताहों के समुद्री तापमान और वायुमंडलीय परिवर्तनों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि यही कारक आगामी मानसून की दिशा और तीव्रता तय करेंगे।