इक्कीसवीं सदी के युद्धों में ड्रोन केवल निगरानी उपकरण नहीं रह गए हैं, बल्कि वे आधुनिक सैन्य रणनीति की रीढ़ बनते जा रहे हैं। सीमा निगरानी, दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने, सटीक हमले करने, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, संचार सहायता और आपदा राहत जैसे अनेक क्षेत्रों में इनकी उपयोगिता लगातार बढ़ी है। यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया के हालिया घटनाक्रमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अपेक्षाकृत कम लागत वाले ड्रोन भी अत्याधुनिक सैन्य प्रणालियों को गंभीर चुनौती दे सकते हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में ड्रोन क्षमता किसी भी देश की सैन्य शक्ति का प्रमुख मानक बनने वाली है।
भारत का ‘काल’ ड्रोन क्यों बना चर्चा का विषय
भारतीय निजी रक्षा उद्योग द्वारा विकसित ‘काल’ ड्रोन को लंबी दूरी तक अभियान चलाने और भारी पेलोड ले जाने की क्षमता के कारण महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह लगभग एक हजार किलोमीटर तक अभियान संचालित करने तथा लगभग दो क्विंटल तक भार लेकर सात से आठ घंटे तक उड़ान भरने में सक्षम है। यद्यपि इसे अभी औपचारिक रूप से भारतीय सशस्त्र बलों में शामिल नहीं किया गया है, फिर भी स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकी की दिशा में इसे महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यदि परीक्षण और मूल्यांकन सफल रहते हैं तो यह भविष्य में भारत की लंबी दूरी की मानवरहित युद्ध क्षमता को मजबूत करने में उपयोगी साबित हो सकता है।
अमेरिका आज भी ड्रोन प्रौद्योगिकी में सबसे आगे
ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में अमेरिका को विश्व का अग्रणी देश माना जाता है। उसके पास निगरानी, सटीक हमला, समुद्री गश्त, खुफिया जानकारी संग्रह और विशेष अभियानों के लिए अनेक अत्याधुनिक मानवरहित विमान हैं। अमेरिकी प्रणालियों की सबसे बड़ी विशेषता उनके उन्नत सेंसर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित डेटा विश्लेषण, सुरक्षित संचार नेटवर्क और लंबी अवधि तक लगातार उड़ान भरने की क्षमता है। आधुनिक युद्ध अभियानों में अमेरिका ने बार-बार यह प्रदर्शित किया है कि मानवरहित प्रणालियां जोखिम कम करते हुए अत्यधिक सटीक सैन्य कार्रवाई कर सकती हैं।
चीन ने तेज़ी से बनाई वैश्विक पहचान
पिछले एक दशक में चीन ने ड्रोन निर्माण और निर्यात के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। छोटे निगरानी ड्रोन से लेकर बड़े सशस्त्र मानवरहित विमानों तक चीन के पास विविध प्रकार की प्रणालियां उपलब्ध हैं। विशेष रूप से ‘स्वार्म ड्रोन’ तकनीक पर उसका निवेश रक्षा विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। इस तकनीक में अनेक ड्रोन एक साथ समन्वित तरीके से अभियान संचालित करते हैं, जिससे विरोधी की वायु रक्षा प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। चीन की रक्षा कंपनियां अनेक देशों को ड्रोन निर्यात भी कर रही हैं, जिससे वैश्विक रक्षा बाजार में उसकी हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है।
तुर्किये, इज़राइल और अन्य देशों की भी मजबूत मौजूदगी
अमेरिका और चीन के अलावा तुर्किये तथा इज़राइल ने भी ड्रोन प्रौद्योगिकी में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। तुर्किये के सशस्त्र ड्रोन अनेक संघर्ष क्षेत्रों में अपनी प्रभावशीलता सिद्ध कर चुके हैं, जबकि इज़राइल लंबे समय से निगरानी और खुफिया अभियानों के लिए अत्याधुनिक मानवरहित प्रणालियां विकसित करता रहा है। यूरोप के कई देश भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अगली पीढ़ी के ड्रोन विकसित कर रहे हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य केवल सैन्य शक्ति बढ़ाना नहीं, बल्कि भविष्य के नेटवर्क-केंद्रित युद्धों के लिए नई तकनीकी क्षमता विकसित करना भी है।
भारत के लिए आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण अवसर
भारत ने हाल के वर्षों में रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दी है। सरकारी और निजी क्षेत्र के सहयोग से अनेक स्वदेशी ड्रोन विकसित किए जा रहे हैं, जिनका उपयोग सेना, नौसेना, वायुसेना तथा अर्धसैनिक बलों द्वारा किया जा सकता है। सीमा सुरक्षा, समुद्री निगरानी, आतंकवाद विरोधी अभियान और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी इन प्रणालियों की उपयोगिता लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अनुसंधान, विकास और उत्पादन की गति इसी प्रकार बनी रही तो भारत न केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा, बल्कि भविष्य में वैश्विक ड्रोन बाजार में भी महत्वपूर्ण स्थान बना सकता है।
भविष्य की लड़ाइयों का निर्णायक हथियार
रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि भविष्य के युद्ध केवल सैनिकों और पारंपरिक हथियारों से नहीं, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वायत्त प्रणालियों, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और मानवरहित प्लेटफॉर्मों के समन्वित उपयोग से तय होंगे। ऐसे परिदृश्य में ड्रोन केवल सहायक उपकरण नहीं रहेंगे, बल्कि सैन्य रणनीति के केंद्र में होंगे। भारत सहित अनेक देश इस बदलते सैन्य परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए नई पीढ़ी की ड्रोन तकनीक में बड़े निवेश कर रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में आकाश पर नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा और अधिक तीव्र होने वाली है।