महाराष्ट्र में भाषा को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच राज्य सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए आयोजित होने वाली हिंदी भाषा परीक्षा को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।
सरकार के नए आदेश में उन पुराने सरकारी प्रस्तावों और आदेशों को भी रद्द कर दिया गया है, जिनके आधार पर हिंदी भाषा परीक्षा की व्यवस्था संचालित हो रही थी। यह व्यवस्था वर्ष 1976 से चली आ रही थी और बाद में 1981 के आदेशों के जरिए भी इससे जुड़े प्रावधान लागू रहे।इस तरह करीब पांच दशक पुरानी हिंदी परीक्षा व्यवस्था पर अब पूरी तरह विराम लग गया है।
अब प्रमोशन और इंक्रीमेंट के लिए हिंदी परीक्षा जरूरी नहीं
पहले ऐसे अधिकारी और कर्मचारी, जिन्होंने 10वीं कक्षा तक हिंदी विषय नहीं पढ़ा था, उन्हें नौकरी के दौरान हिंदी भाषा परीक्षा पास करनी पड़ती थी।परीक्षा पास नहीं करने की स्थिति में उनके वेतन में इंक्रीमेंट या प्रमोशन प्रभावित हो सकता था। नए फैसले के बाद यह बाध्यता समाप्त हो गई है।अब सरकारी कर्मचारियों को नौकरी में वेतन वृद्धि या पदोन्नति के लिए हिंदी भाषा परीक्षा पास करने की जरूरत नहीं होगी।
जून में हुई थी परीक्षा की घोषणा
यह मामला जून 2026 में चर्चा में आया था। उस समय भाषा संचालनालय ने सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए हिंदी भाषा परीक्षा आयोजित करने की घोषणा की थी।परीक्षा के लिए 28 जून 2026 की तारीख निर्धारित की गई थी। घोषणा के बाद ही महाराष्ट्र में इसका विरोध शुरू हो गया।राजनीतिक दलों के अलावा कई मराठी भाषा संगठनों ने भी सरकार के फैसले पर सवाल उठाए और हिंदी परीक्षा की अनिवार्यता का विरोध किया।
MNS ने दी थी परीक्षा केंद्रों पर प्रदर्शन की चेतावनी
हिंदी परीक्षा के विरोध में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) सबसे मुखर रही। MNS नेता संदीप देशपांडे ने इसे केंद्र के इशारे पर हिंदी थोपने की कोशिश बताया था।पार्टी ने चेतावनी दी थी कि यदि 28 जून को परीक्षा आयोजित की गई तो उसके कार्यकर्ता परीक्षा केंद्रों पर प्रदर्शन करेंगे।
शिवसेना UBT ने भी उठाए सवाल
उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना UBT ने भी हिंदी परीक्षा के मुद्दे पर राज्य सरकार को घेरा था।पार्टी ने सवाल उठाया था कि जब मराठी को हाल ही में शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिला है, तो महाराष्ट्र के सरकारी कर्मचारियों के लिए हिंदी परीक्षा पास करना क्यों जरूरी किया जा रहा है।इसके साथ ही पार्टी की ओर से यह सवाल भी उठाया गया था कि क्या गुजरात या पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में सरकारी कर्मचारियों के लिए हिंदी परीक्षा अनिवार्य है।
7 मई 2026 से प्रभावी माना गया फैसला
सरकार के नए आदेश में 1976 और 1981 से लागू पुराने सरकारी प्रस्तावों और आदेशों को रद्द किया गया है। नए फैसले को 7 मई 2026 से प्रभावी माना जाएगा।यानी जिस तारीख से सरकार ने विरोध के बीच पहली बार हिंदी परीक्षा पर रोक लगाने की दिशा में कदम उठाया था, उसी तारीख से इस व्यवस्था को समाप्त माना गया है।
सरकार ने क्या बताया तर्क?
सरकार के फैसले के पीछे प्रशासनिक भाषा से जुड़ा तर्क भी सामने आया है। महाराष्ट्र में राज्य के भीतर प्रशासनिक कामकाज की भाषा मराठी है, जबकि दूसरे राज्यों के साथ आधिकारिक पत्राचार अंग्रेजी में किया जाता है।ऐसे में सरकार का मानना है कि सरकारी कर्मचारियों पर अलग से हिंदी भाषा परीक्षा पास करने की बाध्यता बनाए रखने का औचित्य नहीं रह जाता।