नई दिल्ली. देश में इस मानसून सीजन यानी जून से सितंबर के दौरान दीर्घ अवधि औसत की 87.4 प्रतिशत बारिश हुई। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने बुधवार को यह जानकारी दी। मौसम विभाग के अनुसार मानसून सीजन में सामान्य बारिश 868.6 मिमी होती है जबकि इस साल देश में 759.4 मिमी बारिश दर्ज की गई। पूरे सीजन में बारिश का यह स्तर सामान्य से कम रहा। आंकड़ों से साफ है कि मानसून इस बार अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा। कृषि और जल संसाधनों पर इसका असर पड़ सकता है।
सामान्य से कितनी कमी
वर्तमान में देश में एक जून से 30 सितंबर के बीच हुई बारिश में करीब 13 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। सामान्य औसत 868.6 मिमी के मुकाबले वास्तविक बारिश 759.4 मिमी रही। यह कमी विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रूप में महसूस की गई होगी। कम बारिश से कुछ इलाकों में सूखे जैसी स्थिति बनने की आशंका रहती है। वहीं कुछ क्षेत्रों में समय पर बारिश न होने से फसल चक्र प्रभावित हो सकता है। समग्र आंकड़ा देश के लिए चिंता का विषय है।
2001 के बाद चौथा सबसे कम
मौसम विभाग ने कहा कि इस मानसून सीजन के दौरान देश में हुई बारिश वर्ष 2001 के बाद से चौथी सबसे कम है। पिछले दो दशकों में यह आंकड़ा चौथे स्थान पर है। कम बारिश के ऐसे रिकॉर्ड कृषि उत्पादन और जल भंडारण पर असर डालते हैं। लंबे समय के आंकड़ों से तुलना करने पर इस साल का प्रदर्शन कमजोर रहा। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के बीच ऐसे आंकड़े महत्वपूर्ण हो जाते हैं। भविष्य की रणनीतियों में इन रुझानों को ध्यान में रखना होगा।
दीर्घ अवधि औसत क्या है
एलपीए यानी दीर्घ अवधि औसत किसी क्षेत्र में किसी महीने या मौसम के दौरान होने वाली बारिश का 30 से 50 वर्षों के लंबे समय के आंकड़ों के आधार पर निकाला गया औसत होता है। मौसम विभाग इसी औसत के आधार पर सामान्य अधिक या कम बारिश का आकलन करता है। इस साल 87.4 प्रतिशत बारिश का मतलब है कि औसत से 12.6 प्रतिशत कम बारिश हुई। एलपीए की गणना लंबे आंकड़ों पर आधारित होने से विश्वसनीय मानी जाती है। इसके आधार पर ही मौसमी पूर्वानुमान और योजनाएं बनाई जाती हैं।
क्षेत्रीय प्रभाव की संभावना
कम बारिश का असर अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में भिन्न हो सकता है। कुछ इलाकों में सामान्य या अधिक बारिश हुई होगी जबकि कई क्षेत्रों में कमी दर्ज की गई। कृषि प्रधान क्षेत्रों में इसका सीधा प्रभाव फसलों पर पड़ सकता है। जलाशयों और भूजल स्तर पर भी दबाव बढ़ने की संभावना है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिहाज से ये आंकड़े महत्वपूर्ण हैं। क्षेत्रीय स्तर पर विस्तृत आंकड़ों का विश्लेषण आगे की योजना के लिए जरूरी होगा।
आगे की चुनौतियां
मानसून की कमी से रबी सीजन की तैयारी और जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। किसानों को वैकल्पिक उपाय अपनाने की सलाह दी जा सकती है। जल संरक्षण और कुशल सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देना होगा। मौसम विभाग के आंकड़े नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण इनपुट हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में मानसून के पैटर्न में बदलाव को समझना और अनुकूलन करना आवश्यक हो गया है। इस साल की कमी से सीख लेकर भविष्य की तैयारियां मजबूत करनी होंगी।