रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी आने वाले समय में अर्थव्यवस्था पर मुद्रास्फीति का अतिरिक्त दबाव बना सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 15 मई के बाद से ईंधन की कीमतों में लगभग 7.5 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि दर्ज की जा चुकी है और यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो यह बढ़ोतरी 10 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती है। इसका सीधा असर परिवहन, उत्पादन और वितरण लागत पर पड़ने की आशंका है।
खुदरा महंगाई में हो सकती है उल्लेखनीय वृद्धि
रिपोर्ट के मुताबिक ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा प्रभाव खुदरा मुद्रास्फीति पर पड़ेगा। अनुमान है कि 7.5 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि से खुदरा महंगाई दर में करीब 0.36 प्रतिशत तक का इजाफा हो सकता है। वहीं यदि कीमतों में 10 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी होती है, तो महंगाई में लगभग 0.48 प्रतिशत की अतिरिक्त वृद्धि देखने को मिल सकती है। इससे आम उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति पर असर पड़ सकता है।
सड़क परिवहन पर सबसे ज्यादा असर
देश में माल ढुलाई का बड़ा हिस्सा सड़क मार्ग के माध्यम से होता है और इस क्षेत्र की लागत का लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा ईंधन पर निर्भर करता है। ऐसे में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने से ट्रांसपोर्ट कंपनियों का खर्च बढ़ेगा, जिसका असर वस्तुओं की अंतिम कीमतों पर दिखाई देगा। भारत में लगभग 71 प्रतिशत माल परिवहन सड़क मार्ग से होता है, इसलिए ईंधन महंगाई का प्रभाव व्यापक स्तर पर महसूस किया जा सकता है।
खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आ सकती है तेजी
ढुलाई लागत बढ़ने से दूध, फल, सब्जियां, दालें, चाय, कॉफी, मसाले, अंडे, मांस और मछली जैसे उत्पादों की कीमतों में तेजी आने की संभावना जताई गई है। ये सभी वस्तुएं बड़े पैमाने पर परिवहन नेटवर्क पर निर्भर रहती हैं। ऐसे में ईंधन महंगा होने का सीधा असर रसोई के बजट पर पड़ सकता है और उपभोक्ताओं को रोजमर्रा की खरीदारी के लिए अधिक खर्च करना पड़ सकता है।
उद्योगों पर भी बढ़ेगा लागत का दबाव
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कपड़ा, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, लकड़ी उत्पाद, सीमेंट, सिरेमिक, रसायन, कोयला और धातु उद्योग भी लागत वृद्धि की मार झेल सकते हैं। उत्पादन और परिवहन दोनों महंगे होने के कारण कंपनियां या तो उत्पादों की कीमत बढ़ा सकती हैं या फिर लागत संतुलित करने के लिए उत्पाद की मात्रा कम कर सकती हैं। ऐसे में ईंधन कीमतों का प्रभाव केवल परिवहन क्षेत्र तक सीमित न रहकर पूरी अर्थव्यवस्था में महसूस किया जा सकता है।
आम उपभोक्ता के लिए क्या संकेत?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतों में राहत नहीं मिलती, तो आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है। ऐसे में परिवारों के मासिक बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका है। बढ़ती परिवहन लागत, महंगे खाद्य पदार्थ और ऊंची उत्पादन लागत मिलकर उपभोक्ताओं के खर्च को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए ईंधन बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव पर सरकार, उद्योग और आम नागरिकों की नजर बनी हुई है।