नई दिल्ली. प्रधानमंत्री जन धन योजना ने अपने 12 वर्ष पूरे कर लिए हैं और इस अवसर पर सरकार ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के जरिए आम लोगों तक पहुंची रकम और वित्तीय समावेशन की उपलब्धियों को सामने रखा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले 12 वर्षों में विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों को डीबीटी के माध्यम से 53 लाख करोड़ रुपये हस्तांतरित किए गए हैं। इस व्यवस्था का बड़ा लाभ यह हुआ कि सरकारी सहायता को सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों तक पहुंचाने का रास्ता मजबूत हुआ और भुगतान की प्रक्रिया में बिचौलियों की भूमिका कम करने में मदद मिली। सरकार का कहना है कि जन धन खातों के व्यापक नेटवर्क ने इस व्यवस्था को जमीन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बैंक खाता नहीं होने की समस्या से जूझने वाले करोड़ों लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ना इस पूरी पहल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में माना जा रहा है।
59 करोड़ जन धन खातों का बना बड़ा नेटवर्क
प्रधानमंत्री जन धन योजना की शुरुआत 28 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी। इसका उद्देश्य देश के प्रत्येक वयस्क को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ना और उन लोगों तक वित्तीय सेवाएं पहुंचाना था, जो लंबे समय तक औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से बाहर रहे। सरकार के अनुसार वर्तमान में जन धन खातों की संख्या 59 करोड़ तक पहुंच चुकी है। इनमें करीब 33 करोड़ खाते महिलाओं के नाम पर हैं, जो कुल जन धन खातों का लगभग 56% है। महिलाओं की इतनी बड़ी भागीदारी वित्तीय समावेशन के सामाजिक प्रभाव को भी दर्शाती है, क्योंकि बैंक खाते के माध्यम से महिलाओं को सरकारी सहायता, बचत और डिजिटल वित्तीय सेवाओं तक अपेक्षाकृत अधिक सीधी पहुंच मिली है। योजना ने बैंकिंग को केवल शहरों और मध्यम वर्ग तक सीमित व्यवस्था के बजाय व्यापक जनसंख्या के लिए उपलब्ध सेवा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
डीबीटी से बिचौलियों की भूमिका हुई कम
प्रत्यक्ष लाभ अंतरण व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य सरकारी योजनाओं की रकम को सीधे पात्र व्यक्ति के खाते तक पहुंचाना है। पहले कई कल्याणकारी योजनाओं में भुगतान की प्रक्रिया लंबी होने और विभिन्न स्तरों से गुजरने के कारण लाभार्थियों तक रकम पहुंचने में देरी तथा रिसाव की शिकायतें सामने आती थीं। डीबीटी ने इस प्रक्रिया को बैंक खातों और डिजिटल भुगतान प्रणाली से जोड़कर सरकारी सहायता के हस्तांतरण को अधिक सीधा बनाया। सरकार के अनुसार पिछले 12 वर्षों में 53 लाख करोड़ रुपये का हस्तांतरण इस व्यवस्था के व्यापक पैमाने को दर्शाता है। हालांकि किसी भी कल्याणकारी व्यवस्था की वास्तविक सफलता केवल हस्तांतरित राशि से नहीं, बल्कि पात्र लाभार्थियों की सही पहचान, समय पर भुगतान और अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी पहुंच से तय होती है। इसके बावजूद जन धन खातों और डीबीटी के संयोजन ने भारत के सामाजिक सुरक्षा ढांचे में महत्वपूर्ण बदलाव जरूर किया है।
ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में 46 करोड़ खाते
जन धन योजना का प्रभाव केवल महानगरों और बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में करीब 46 करोड़ जन धन खाते हैं, जो कुल खातों का लगभग 78% हैं। यह आंकड़ा बताता है कि वित्तीय समावेशन की इस पहल का बड़ा हिस्सा देश के ग्रामीण और छोटे कस्बाई क्षेत्रों तक पहुंचा है। जिन इलाकों में बैंक की पारंपरिक शाखाओं तक पहुंच कठिन रही है, वहां बैंक मित्रों और डिजिटल बैंकिंग सेवाओं ने वित्तीय सेवाओं को लोगों के नजदीक पहुंचाने में भूमिका निभाई है। बैंक खाता होने से ग्रामीण परिवारों के लिए सरकारी सहायता प्राप्त करना, छोटी बचत करना और औपचारिक वित्तीय प्रणाली का हिस्सा बनना आसान हुआ है। इसके साथ ही बैंकिंग सेवाओं के विस्तार ने डिजिटल भुगतान और वित्तीय लेनदेन के लिए भी आधार तैयार किया है।
महिलाओं के नाम खाते, वित्तीय भागीदारी को मिला आधार
जन धन योजना की उपलब्धियों में महिलाओं के नाम खुले खातों की बड़ी संख्या को विशेष महत्व दिया जा रहा है। करीब 33 करोड़ महिला खाताधारकों का होना इस बात का संकेत है कि योजना ने महिलाओं को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने में व्यापक प्रभाव डाला है। बैंक खाते के माध्यम से महिलाओं के लिए सरकारी योजनाओं की राशि सीधे प्राप्त करना और अपनी वित्तीय गतिविधियों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ना संभव हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह बदलाव और महत्वपूर्ण हो जाता है, जहां महिलाओं की स्वतंत्र बैंकिंग पहुंच लंबे समय तक सीमित रही है। हालांकि केवल बैंक खाता खुल जाना वित्तीय सशक्तीकरण की अंतिम मंजिल नहीं है। खाते का नियमित उपयोग, डिजिटल लेनदेन की समझ, बचत की आदत और ऋण तथा बीमा जैसी वित्तीय सेवाओं तक पहुंच बढ़ाना अगला महत्वपूर्ण चरण है।
न्यूनतम शेष राशि की बाध्यता नहीं
प्रधानमंत्री जन धन योजना की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसके तहत खोले गए खातों में न्यूनतम शेष राशि बनाए रखने की अनिवार्यता नहीं है। इससे कम आय वाले परिवारों और अनियमित आय वाले लोगों के लिए बैंकिंग व्यवस्था में बने रहना अपेक्षाकृत आसान हुआ है। खाताधारकों को रुपे डेबिट कार्ड भी उपलब्ध कराया जाता है, जिसके साथ दुर्घटना बीमा जैसी सुविधाएं जुड़ी हैं। योजना के तहत पात्र खाताधारकों को ओवरड्राफ्ट सुविधा का प्रावधान भी किया गया है, जिससे अचानक आर्थिक आवश्यकता सामने आने पर सीमित अतिरिक्त वित्तीय सहायता मिल सकती है। इन सुविधाओं का उद्देश्य बैंक खाते को केवल सरकारी रकम प्राप्त करने का माध्यम न बनाकर सामान्य वित्तीय जीवन का हिस्सा बनाना है। यही कारण है कि जन धन योजना को भारत के वित्तीय समावेशन कार्यक्रम की आधारभूत योजनाओं में गिना जाता है।
41 करोड़ से अधिक रुपे कार्ड ने बढ़ाया डिजिटल जुड़ाव
जन धन खाताधारकों को अब तक 41 करोड़ से अधिक रुपे कार्ड जारी किए जा चुके हैं। इन कार्डों ने बड़ी संख्या में नए बैंक खाताधारकों को डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जोड़ने का आधार उपलब्ध कराया है। बैंकिंग सेवाओं का विस्तार केवल खाता खोलने तक सीमित नहीं रह सकता, इसलिए कार्ड, डिजिटल भुगतान और बैंक मित्र नेटवर्क का विकास इस पूरी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में जहां बैंक शाखाएं सीमित हैं, वहां बैंक मित्रों के माध्यम से नकद निकासी, जमा और अन्य मूलभूत बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है। सरकार के अनुसार देशभर में 13.5 लाख से अधिक बैंक मित्र इस नेटवर्क को अंतिम छोर तक पहुंचाने में सहायता कर रहे हैं। इससे बैंकिंग प्रणाली की भौतिक पहुंच और डिजिटल वित्तीय ढांचे के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी तैयार हुई है।
12 साल बाद अगली चुनौती खाते के इस्तेमाल की
जन धन योजना ने बैंक खाता खोलने के स्तर पर व्यापक पहुंच हासिल कर ली है, लेकिन अब चुनौती इन खातों को सक्रिय और उपयोगी वित्तीय साधन बनाए रखने की है। किसी खाते का वास्तविक महत्व तब बढ़ता है, जब उसमें नियमित लेनदेन हो, बचत की आदत विकसित हो और खाताधारक बीमा, पेंशन, ऋण तथा डिजिटल भुगतान जैसी दूसरी वित्तीय सेवाओं का भी उपयोग कर सके। ग्रामीण भारत में वित्तीय साक्षरता बढ़ाना इस दिशा में महत्वपूर्ण होगा, ताकि नए खाताधारक डिजिटल धोखाधड़ी और अनधिकृत लेनदेन से भी सुरक्षित रह सकें। आने वाले वर्षों में जन धन योजना का मूल्यांकन केवल खातों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके सक्रिय उपयोग और परिवारों की आर्थिक सुरक्षा में उनके वास्तविक योगदान से किया जाएगा। 12 वर्षों की उपलब्धियों के बाद यही अगला चरण भारत के वित्तीय समावेशन को अधिक गहरा और टिकाऊ बना सकता है।