रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के 36वें दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने विद्यार्थियों और युवाओं को संबोधित करते हुए राष्ट्र निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के चरित्र, सोच और सामाजिक उत्तरदायित्व को भी आकार देती है। राष्ट्रपति ने युवाओं को भविष्य की सबसे बड़ी शक्ति बताते हुए कहा कि उनके भीतर समाज और राष्ट्र को नई दिशा देने की अद्भुत क्षमता मौजूद है। इसलिए उन्हें ज्ञान, कौशल और नैतिक मूल्यों के संतुलित विकास पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
रानी दुर्गावती के आदर्श आज भी हैं प्रासंगिक
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में वीरांगना रानी दुर्गावती के अद्वितीय योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि वे साहस, त्याग, परिश्रम और बलिदान की जीवंत प्रतिमूर्ति थीं। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्यों और मूल्यों से समझौता नहीं किया तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गईं। राष्ट्रपति ने कहा कि जिस विश्वविद्यालय का नाम ऐसी महान विभूति के नाम पर रखा गया है, वहां अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों को भी उनके जीवन से प्रेरणा लेकर समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझना चाहिए।
आधुनिकता और परंपरा का संतुलन है विकास की कुंजी
अपने संबोधन के दौरान राष्ट्रपति मुर्मू ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि विकास और आधुनिकता की दिशा में आगे बढ़ते समय समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटना नहीं चाहिए। उन्होंने कहा कि तेजी से बदलती दुनिया में तकनीकी प्रगति और आधुनिक जीवनशैली आवश्यक हैं, लेकिन इनके साथ-साथ परंपराओं, सांस्कृतिक मूल्यों और राष्ट्रीय पहचान का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उनका मानना है कि जब आधुनिक सोच और सांस्कृतिक विरासत साथ-साथ आगे बढ़ती हैं, तभी संतुलित और स्थायी विकास का मार्ग प्रशस्त होता है।
मुख्यधारा से वंचित वर्गों को जोड़ना समय की आवश्यकता
राष्ट्रपति ने समावेशी विकास की अवधारणा पर बल देते हुए कहा कि विकास की प्रक्रिया तभी सार्थक मानी जाएगी जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक उसके लाभ पहुंचें। उन्होंने कहा कि जो लोग अब तक विकास की मुख्यधारा से दूर रहे हैं, उन्हें अवसर प्रदान करना और आगे बढ़ाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। विशेष रूप से जनजातीय समाज और ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं में प्रतिभा और कौशल की कोई कमी नहीं है, आवश्यकता केवल उन्हें उचित अवसर और संसाधन उपलब्ध कराने की है। इससे राष्ट्र की प्रगति अधिक व्यापक और न्यायसंगत बन सकेगी।
बेटियों की सफलता से मजबूत हो रहा नया भारत
दीक्षांत समारोह में स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों में बेटियों की अधिक संख्या पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए राष्ट्रपति ने इसे देश के बदलते सामाजिक परिदृश्य का सकारात्मक संकेत बताया। उन्होंने कहा कि महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और उपलब्धियां राष्ट्र के सर्वांगीण विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। आज शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, खेल और अन्य क्षेत्रों में महिलाएं नई ऊंचाइयों को छू रही हैं। यह परिवर्तन केवल महिलाओं की सफलता नहीं, बल्कि पूरे समाज की प्रगति और सशक्तिकरण का प्रतीक है।
युवाओं के सामने अवसर भी हैं और बड़ी जिम्मेदारियां भी
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि भारत विश्व के सबसे युवा देशों में शामिल है और देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी युवा वर्ग से संबंधित है। यह जनसांख्यिकीय शक्ति भारत के लिए एक बड़ी पूंजी है। उन्होंने कहा कि युवाओं में कुछ भी कर गुजरने का साहस और नई सोच को वास्तविकता में बदलने की क्षमता है। हालांकि इसके साथ ही उनके कंधों पर राष्ट्र के भविष्य को आकार देने की जिम्मेदारी भी है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि उचित शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के अवसर मिलने पर युवा देश को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकते हैं।
भारतीय संस्कृति के मूल्य ही देंगे स्थायी शक्ति
अपने संबोधन के अंतिम चरण में राष्ट्रपति ने युवाओं से भारतीय संस्कृति के मूल्यों को जीवन का आधार बनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि सत्य, अहिंसा, करुणा, सेवा और मानवता जैसे आदर्श केवल नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि समाज को स्थिर और सशक्त बनाने वाले मूल तत्व हैं। तेजी से बदलती जीवनशैली और वैश्विक प्रभावों के बीच इन मूल्यों का महत्व और भी बढ़ जाता है। राष्ट्रपति ने कहा कि यदि युवा आधुनिक ज्ञान और तकनीक के साथ इन जीवन मूल्यों को भी आत्मसात करेंगे, तो वे न केवल व्यक्तिगत सफलता प्राप्त करेंगे बल्कि राष्ट्र और समाज के लिए भी सकारात्मक परिवर्तन के वाहक बनेंगे।