नई दिल्ली. नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस यानी NSO की नई स्वास्थ्य रिपोर्ट ने देश में मातृत्व सेवाओं की लागत को लेकर चौंकाने वाला खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, प्राइवेट अस्पतालों में बच्चे के जन्म पर होने वाला खर्च सरकारी अस्पतालों की तुलना में लगभग 16 गुना ज्यादा है। यह आंकड़ा देश में स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते निजीकरण और आम लोगों पर पड़ रहे आर्थिक बोझ को दर्शाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य सुविधाओं की गुणवत्ता और पहुंच को लेकर लोगों की सोच बदल रही है, जिसके चलते निजी अस्पतालों की ओर झुकाव लगातार बढ़ रहा है। हालांकि इसका सीधा असर परिवारों की जेब पर दिखाई दे रहा है।
सरकारी अस्पतालों में बेहद कम है खर्च
रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक वर्ष में सरकारी अस्पतालों में बच्चे के जन्म पर औसत अपनी जेब से किया गया खर्च केवल 2,299 रुपये रहा। यदि सामान्य चिकित्सा खर्च को अलग कर देखा जाए तो यह राशि घटकर लगभग 801 रुपये रह जाती है। सरकारी योजनाओं, सब्सिडी और मुफ्त चिकित्सा सुविधाओं के कारण ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए सरकारी अस्पताल अब भी सबसे बड़ा सहारा बने हुए हैं। यही वजह है कि देश में अधिकांश संस्थागत डिलीवरी अभी भी सरकारी अस्पतालों में ही हो रही हैं।
प्राइवेट अस्पतालों में तेजी से बढ़ रहा खर्च
दूसरी ओर प्राइवेट अस्पतालों में डिलीवरी का खर्च आम परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। NSO के अनुसार निजी अस्पतालों में बच्चे के जन्म पर औसत खर्च 37,630 रुपये तक पहुंच गया है। वहीं सामान्य खर्च के आधार पर भी यह राशि करीब 32 हजार रुपये है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अस्पताल शुल्क, डॉक्टर फीस, मेडिकल टेस्ट, दवाइयों और अतिरिक्त सुविधाओं के कारण निजी अस्पतालों में खर्च कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि एक सामान्य डिलीवरी भी कई परिवारों के लिए बड़ा आर्थिक बोझ बन रही है।
ग्रामीण इलाकों में भी बढ़ रहा प्राइवेट अस्पतालों का चलन
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी निजी अस्पतालों की ओर लोगों का रुझान तेजी से बढ़ रहा है। ग्रामीण भारत में प्राइवेट अस्पतालों में होने वाली डिलीवरी की हिस्सेदारी 21.3 प्रतिशत से बढ़कर 28.8 प्रतिशत तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों के अनुसार गांवों और कस्बों में निजी स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बढ़ने, सड़क और परिवहन सुविधाओं में सुधार तथा लोगों की बदलती प्राथमिकताओं ने इस बदलाव को तेज किया है। अब ग्रामीण परिवार भी बेहतर सुविधा और त्वरित सेवा के लिए निजी अस्पतालों को चुन रहे हैं।
शहरी भारत में निजी अस्पतालों का दबदबा
शहरी क्षेत्रों में प्राइवेट अस्पतालों की भूमिका पहले से ही मजबूत रही है और अब यह हिस्सेदारी और बढ़ गई है। रिपोर्ट के अनुसार शहरी भारत में निजी अस्पतालों में होने वाले प्रसव 47.8 प्रतिशत से बढ़कर 50.8 प्रतिशत तक पहुंच चुके हैं। बड़े शहरों में लोग बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, 24 घंटे उपलब्ध सेवाएं, विशेषज्ञ डॉक्टर और आधुनिक सुविधाओं के कारण निजी अस्पतालों को प्राथमिकता दे रहे हैं। हालांकि इसके साथ चिकित्सा खर्च में भी तेज बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।
क्यों बढ़ रहा है निजी अस्पतालों पर भरोसा?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अधिक खर्च के बावजूद लोगों का भरोसा निजी अस्पतालों पर लगातार बढ़ रहा है। इसके पीछे प्रमुख कारण बेहतर प्रबंधन, कम प्रतीक्षा समय, आधुनिक तकनीक और सेवा गुणवत्ता की मजबूत धारणा मानी जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार कई सरकारी अस्पतालों में संसाधनों और स्टाफ की कमी भी लोगों को निजी विकल्पों की ओर धकेल रही है। खासतौर पर शहरी मध्यम वर्ग अब स्वास्थ्य सेवाओं में सुविधा और गुणवत्ता को प्राथमिकता देने लगा है।
संस्थागत डिलीवरी का बढ़ना सकारात्मक संकेत
रिपोर्ट का एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि देश में संस्थागत डिलीवरी अब लगभग सामान्य हो चुकी है। कुल जन्मों में संस्थागत प्रसव की हिस्सेदारी 96.2 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो मातृ और शिशु स्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित प्रसव के प्रति बढ़ती जागरूकता और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं ने इस बदलाव में अहम भूमिका निभाई है। हालांकि अब चुनौती यह है कि बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं आम लोगों की पहुंच में भी बनी रहें।