मुंबई: भारत में डिजिटल क्रांति का चेहरा बन चुके 'यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस' (UPI) में जल्द ही एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ऑनलाइन धोखाधड़ी और साइबर अपराधों पर लगाम लगाने के लिए यूपीआई लेनदेन की गति को कुछ मामलों में 'धीमा' करने का प्रस्ताव दिया है।
क्या है 'गोल्डन ऑवर' का प्रस्ताव?
आरबीआई के नए प्रस्ताव के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को 10,000 रुपये से अधिक की राशि भेजता है, तो वह पैसा तुरंत प्राप्तकर्ता के खाते में जमा नहीं होगा। इसके बजाय, ग्राहक को एक घंटे का समय मिलेगा, जिसे आरबीआई 'गोल्डन ऑवर' या 'सोनली घंटा' कह रहा है। इस समय सीमा के भीतर, यदि ग्राहक को लगता है कि उसने गलती से या किसी धोखाधड़ी के तहत पैसा भेजा है, तो वह लेनदेन को रद्द (Undo) कर सकेगा।
क्यों पड़ी इस नियम की जरूरत?
1. एप्प (APP) फ्रॉड: 'ऑथराइज्ड पुश पेमेंट' (APP) के जरिए अपराधी बैंक अधिकारी या परिचित बनकर लोगों को तुरंत पैसे भेजने के लिए उकसाते हैं।
2. साइबर अपराध: हाल के दिनों में 'डिजिटल अरेस्ट' और निवेश के नाम पर होने वाली ठगी में भारी बढ़ोतरी हुई है।
3. तात्कालिकता का दुरुपयोग: यूपीआई की रीयल-टाइम विशेषता के कारण पैसा तुरंत ट्रांसफर हो जाता है, जिससे उसे वापस पाना लगभग असंभव होता है।
दुकानदारों और शिक्षण संस्थानों पर असर नहीं
आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि यह नियम केवल व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) लेनदेन पर लागू करने का विचार है। दुकानों पर क्यूआर कोड (QR Code) स्कैन करके किए जाने वाले भुगतान या स्कूल-कॉलेज की फीस जमा करने जैसे लेनदेन पर इसका असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि वहां धोखाधड़ी की संभावना कम होती है।
UPI ऐप में आ सकता है 'Undo' बटन
रिपोर्ट्स के अनुसार, 'नेशनल पमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया' (NPCI) यूपीआई एप्स में एक नया विकल्प जोड़ सकता है। इसमें पैसे भेजने के बाद एक टाइमर चलेगा, जिसे 'सिक्योरिटी कूलिंग पीरियड' कहा जाएगा। इसके अलावा, संदिग्ध लेनदेन की स्थिति में बैंक ग्राहकों से दोबारा पुष्टि (Confirmation) मांग सकते हैं।
गलत ट्रांजैक्शन होने पर क्या करें?
आरबीआई ने सलाह दी है कि यदि वर्तमान व्यवस्था में गलत आईडी पर पैसा चला जाता है, तो तुरंत अपने बैंक को सूचित करें। लेनदेन आईडी, समय, तारीख और स्क्रीनशॉट के साथ आवेदन करने पर बैंक प्राप्तकर्ता के बैंक से संपर्क कर पैसा वापसी की प्रक्रिया शुरू कर सकता है।
रिजर्व बैंक का मानना है कि यह देरी तकनीकी खामी नहीं, बल्कि एक 'व्यवहारिक सुरक्षा' (Behavioral Safety) है, जो आम आदमी की मेहनत की कमाई को सुरक्षित रखने में मील का पत्थर साबित होगी।