नई दिल्ली - नौकरी के दौरान कमाई के साथ-साथ रिटायरमेंट की प्लानिंग करना भी बेहद जरूरी है। रिटायरमेंट के बाद नियमित वेतन बंद हो जाता है, लेकिन स्वास्थ्य, घर-परिवार और रोजमर्रा के खर्च जारी रहते हैं। ऐसे में समय रहते निवेश शुरू करने से भविष्य के लिए आर्थिक सुरक्षा तैयार की जा सकती है। रिटायरमेंट प्लानिंग के लिए नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) और वॉलंटरी प्रोविडेंट फंड (VPF) दो प्रमुख विकल्प हैं।
क्या है NPS?
नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) भारत सरकार की लंबी अवधि की रिटायरमेंट सेविंग्स योजना है, जिसे पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (PFRDA) रेगुलेट करती है। इसका उद्देश्य नौकरी के दौरान नियमित निवेश के जरिए रिटायरमेंट के लिए एक बड़ा फंड तैयार करना और बुढ़ापे में आय का स्रोत उपलब्ध कराना है। NPS में जमा पैसा अलग-अलग एसेट क्लास में निवेश किया जाता है। इसमें इक्विटी का हिस्सा भी हो सकता है, इसलिए इसका रिटर्न बाजार के प्रदर्शन से प्रभावित होता है। यही वजह है कि NPS में रिटर्न की गारंटी नहीं होती, लेकिन लंबे समय में इसमें ग्रोथ की संभावना रहती है।
VPF क्या है?
वॉलंटरी प्रोविडेंट फंड (VPF) उन वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए विकल्प है, जो अपने कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) में अनिवार्य योगदान के अलावा अतिरिक्त रकम जमा करना चाहते हैं। इसमें कर्मचारी अपनी बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ते के आधार पर अतिरिक्त योगदान कर सकता है। VPF का पैसा EPF के साथ ही जमा होता है और इस पर EPF के लिए घोषित ब्याज दर लागू होती है। इसलिए यह उन निवेशकों के लिए आकर्षक हो सकता है जो बाजार से जुड़े निवेश की तुलना में अपेक्षाकृत स्थिर विकल्प पसंद करते हैं।
NPS और VPF में बड़ा अंतर
दोनों योजनाओं का उद्देश्य रिटायरमेंट के लिए फंड तैयार करना है, लेकिन इनके काम करने का तरीका अलग है। NPS बाजार से जुड़ी योजना है, जबकि VPF भविष्य निधि व्यवस्था का हिस्सा है। NPS में निवेश की अवधि लंबी रखने पर बाजार आधारित ग्रोथ का लाभ मिल सकता है, लेकिन उतार-चढ़ाव का जोखिम भी रहता है। वहीं VPF में ब्याज दर सरकार द्वारा घोषित की जाती है और इसका रिटर्न बाजार की रोजाना गतिविधियों पर निर्भर नहीं करता।
टैक्स और निकासी के मामले में क्या बेहतर?
NPS में निवेश पर आयकर कानून के तहत उपलब्ध पात्र कर लाभ मिल सकते हैं। इसके अलावा रिटायरमेंट के समय NPS से मिलने वाली रकम के एक हिस्से को एकमुश्त निकाला जा सकता है और शेष हिस्से का इस्तेमाल नियमों के अनुसार एन्युटी खरीदने में किया जाता है। VPF में भी EPF से जुड़े टैक्स नियम लागू होते हैं। हालांकि, निवेश और निकासी से पहले मौजूदा आयकर नियमों और अपनी रोजगार स्थिति के अनुसार कर प्रभाव को समझना जरूरी है।
किसके लिए NPS और किसके लिए VPF?
अगर कोई निवेशक लंबी अवधि में बाजार आधारित रिटर्न की संभावना चाहता है और उतार-चढ़ाव सहन कर सकता है, तो NPS उपयोगी विकल्प हो सकता है। वहीं जो कर्मचारी अपने EPF के साथ अतिरिक्त योगदान करके अपेक्षाकृत स्थिर रिटायरमेंट फंड बनाना चाहता है, वह VPF पर विचार कर सकता है। हालांकि, दोनों में से किसी एक को सभी लोगों के लिए सार्वभौमिक रूप से बेहतर नहीं कहा जा सकता। उम्र, आय, जोखिम लेने की क्षमता, रिटायरमेंट तक बचा समय और टैक्स स्थिति के आधार पर फैसला लेना चाहिए।
रिटायरमेंट प्लानिंग में संतुलन जरूरी
रिटायरमेंट के लिए सिर्फ एक निवेश विकल्प पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग साधनों में संतुलित निवेश रणनीति बनाई जा सकती है। निवेश शुरू करने से पहले संबंधित योजना के मौजूदा नियम, ब्याज/रिटर्न, टैक्स और निकासी शर्तों की जांच करना जरूरी है।
निष्कर्ष: NPS ग्रोथ और पेंशन-केंद्रित रिटायरमेंट प्लानिंग के लिए उपयोगी हो सकता है, जबकि VPF EPF से जुड़े अतिरिक्त निवेश के जरिए स्थिरता चाहने वाले कर्मचारियों के लिए आकर्षक विकल्प हो सकता है। सही चुनाव आपकी वित्तीय जरूरतों और जोखिम क्षमता पर निर्भर करेगा।