डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से 4 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आ चुकी है। गुरुवार को रुपया 95 प्रति डॉलर के पार पहुंच गया, जिससे बाजार में चिंता और बढ़ गई। विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल रुपये में तेज रिकवरी की संभावना भी कमजोर दिखाई दे रही है।
ईरान संकट ने बढ़ाया वैश्विक दबाव
अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों के बाद दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएं दबाव में आ गई हैं। सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ रहा है जो ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं। भारत भी इसी स्थिति में फंसा नजर आ रहा है, जहां तेल आयात महंगा होने से मुद्रा पर दबाव बढ़ रहा है।
2022 के बाद सबसे महंगा हुआ क्रूड
ब्रेंट क्रूड की कीमतें 2022 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच चुकी हैं। शुक्रवार को इसकी कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि एक दिन पहले यह 126 डॉलर तक पहुंच गई थी। दो महीने पहले तक यही कीमत करीब 72 डॉलर प्रति बैरल थी, लेकिन अब इसके 150 डॉलर तक जाने की आशंका जताई जा रही है।
बढ़ता आयात बिल बना सबसे बड़ी चिंता
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से भारत का आयात बिल लगातार बढ़ रहा है। तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे रुपये की वैल्यू कमजोर हो रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक क्रूड में प्रति बैरल 10 डॉलर की बढ़ोतरी भारत की GDP पर 0.5 प्रतिशत तक असर डाल सकती है।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने बढ़ाया दबाव
रुपये पर दूसरी बड़ी मार विदेशी निवेशकों की निकासी से पड़ रही है। इस साल अब तक विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से 20 अरब डॉलर से ज्यादा निकाल चुके हैं। वैश्विक अनिश्चितता के बीच निवेशकों का रुझान सुरक्षित बाजारों की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है।
RBI की चुनौती फिर बढ़ी
साल 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी रुपये पर इसी तरह का दबाव देखने को मिला था। उस समय RBI ने हस्तक्षेप कर स्थिति संभालने की कोशिश की थी और कुछ राहत भी मिली थी। लेकिन मौजूदा हालात में महंगा तेल, कमजोर सप्लाई चेन और विदेशी निकासी ने केंद्रीय बैंक की चिंता फिर बढ़ा दी है।
आम लोगों पर भी दिख सकता है असर
रुपये की कमजोरी और महंगे तेल का असर आने वाले समय में महंगाई के रूप में दिखाई दे सकता है। पेट्रोल-डीजल से लेकर परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं तक कीमतें बढ़ने की आशंका है। यदि हालात लंबे समय तक बने रहे तो इसका असर देश की आर्थिक रफ्तार पर भी पड़ सकता है।