तिरुवनंतपुरम। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत वंदे मातरम के सभी छह छंदों को अनिवार्य रूप से गाने या बजाने की व्यवस्था पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत का सम्मान सभी करते हैं, लेकिन हर कार्यक्रम की शुरुआत और समापन पर इसका पूरा संस्करण गाना व्यावहारिक रूप से लोगों के लिए बोझिल हो सकता है।
क्या बोले शशि थरूर?
थरूर ने कहा कि वंदे मातरम भारत का राष्ट्रगीत है और जब यह बजता है तो लोग सम्मान में खड़े होते हैं। हालांकि, अधिकांश लोगों को इसके शुरुआती एक-दो छंद ही याद होते हैं। उनका मानना है कि लंबे संस्करण को बार-बार गाना या सुनना सभी कार्यक्रमों में व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने फरवरी 2026 में दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां शुरुआत और अंत दोनों में वंदे मातरम का पूरा संस्करण बजाया गया था, जिससे लोगों को लंबे समय तक खड़े रहना पड़ा।
कानून नहीं, परंपरा रही है
थरूर ने कहा कि अब तक अधिकांश सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम के शुरुआती छंद गाने की परंपरा रही है, जबकि कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रगान बजाया जाता था। उन्होंने यह भी कहा कि संसद द्वारा ऐसा कोई कानून पारित नहीं किया गया है जो सभी छह छंदों को अनिवार्य बनाता हो। उनके अनुसार, इस विषय पर सभी पक्षों के बीच सहमति से समाधान निकाला जाना चाहिए।
बीजेपी पर साधा निशाना
थरूर ने बाद में अपने बयान में कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय से वंदे मातरम के शुरुआती छंदों के गायन की परंपरा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है और भाजपा नेताओं को चुनौती दी कि वे स्वयं राष्ट्रगीत के सभी छंद गाकर दिखाएं।
क्या हैं नए दिशा-निर्देश?
केंद्र सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार सरकारी कार्यक्रमों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य औपचारिक आयोजनों में वंदे मातरम का पूरा संस्करण प्रस्तुत किया जा सकता है। नए प्रावधानों के तहत गीत के सभी छह अंतरों की अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड बताई गई है। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित लोगों से सम्मानपूर्वक खड़े रहने की अपेक्षा की जाती है।
वंदे मातरम का इतिहास
Bankim Chandra Chattopadhyay ने वर्ष 1875 में वंदे मातरम की रचना की थी। यह बाद में उनके प्रसिद्ध उपन्यास Anandamath में प्रकाशित हुआ। वर्ष 1896 में Rabindranath Tagore ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार इसे सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत राष्ट्रीय चेतना और आजादी के संघर्ष का प्रमुख प्रतीक बन गया था।