नई दिल्ली. सिलीगुड़ी गलियारा भारत के लिए केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है। पश्चिम बंगाल में स्थित यह संकरा क्षेत्र देश के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर के आठ राज्यों से जोड़ता है। कई स्थानों पर इसकी चौड़ाई लगभग 20 से 22 किलोमीटर तक ही सीमित मानी जाती है। यही कारण है कि दशकों से रक्षा विशेषज्ञ इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में गिनते रहे हैं। किसी भी आपात या युद्धकालीन स्थिति में इस क्षेत्र की सुरक्षा भारत के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता मानी जाती है।
भौगोलिक स्थिति बनाती है इसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील
सिलीगुड़ी गलियारे की भौगोलिक स्थिति इसे और अधिक महत्वपूर्ण बना देती है। इसके पश्चिम में नेपाल, पूर्व में बांग्लादेश तथा उत्तर में भूटान स्थित है, जबकि निकटवर्ती क्षेत्र में चीन से जुड़ी चुंबी घाटी मौजूद है। यही वजह है कि इस क्षेत्र को लेकर लंबे समय से रणनीतिक चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं। सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र पर किसी प्रकार का दबाव उत्पन्न हो जाए तो पूर्वोत्तर राज्यों की कनेक्टिविटी प्रभावित हो सकती है। इसी संभावना को ध्यान में रखते हुए केंद्र और राज्य स्तर पर सुरक्षा ढांचे को और मजबूत बनाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।
सैन्य ढांचे और आधारभूत संरचना का होगा विस्तार
रिपोर्टों के अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी परियोजनाओं के लिए भूमि उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को मंजूरी मिलने के बाद क्षेत्र में आधारभूत संरचना विकास की रफ्तार तेज हो गई है। प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों के आधुनिकीकरण, सैन्य आवागमन की क्षमता बढ़ाने और भारी सैन्य उपकरणों की त्वरित तैनाती सुनिश्चित करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसके साथ ही युद्धकालीन परिस्थितियों में रसद आपूर्ति को निर्बाध बनाए रखने के लिए सुरक्षित परिवहन नेटवर्क और वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर भी कार्य किए जाने की चर्चा है। उद्देश्य यह है कि किसी भी संकट की स्थिति में सेना को तेज, सुरक्षित और सतत आपूर्ति मिलती रहे।
‘राइनो नेक’ की अवधारणा क्या है?
रक्षा और रणनीतिक मामलों से जुड़े विशेषज्ञ अब सिलीगुड़ी गलियारे को “राइनो नेक” यानी गेंडे जैसी मजबूत सुरक्षा ढाल के रूप में विकसित करने की बात कर रहे हैं। इसका आशय इस क्षेत्र को इतना सक्षम और सुरक्षित बनाना है कि किसी भी संभावित सैन्य या सुरक्षा चुनौती का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके। अतिरिक्त सैन्य ठिकानों, फॉरवर्ड बेस, निगरानी तंत्र और आधुनिक लॉजिस्टिक नेटवर्क के विकास से इस क्षेत्र की सामरिक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद जताई जा रही है।
चीन और पाकिस्तान की नजरों में क्यों महत्वपूर्ण है यह क्षेत्र?
वर्ष 2017 में डोकलाम गतिरोध के दौरान इस क्षेत्र की सामरिक संवेदनशीलता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी थी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत सिलीगुड़ी गलियारे को सैन्य, तकनीकी और लॉजिस्टिक दृष्टि से और अधिक सुदृढ़ बना देता है, तो किसी भी बाहरी दबाव या रणनीतिक चुनौती का प्रभाव काफी हद तक कम किया जा सकेगा। सुरक्षा एजेंसियां पहले से ही पूर्वोत्तर और सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ, तस्करी तथा अन्य सुरक्षा चुनौतियों पर सतर्क निगरानी बनाए हुए हैं। ऐसे में सिलीगुड़ी गलियारे का सशक्तीकरण भारत की दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के नए अध्याय की ओर बढ़ता भारत
सिलीगुड़ी गलियारे को मजबूत बनाने की यह पहल केवल एक क्षेत्रीय परियोजना नहीं बल्कि भारत की व्यापक सुरक्षा सोच का हिस्सा है। बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में सीमाई क्षेत्रों की सुरक्षा, सैन्य तैयारियों की गति और रणनीतिक संपर्क मार्गों की मजबूती किसी भी राष्ट्र की शक्ति का महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है। यदि प्रस्तावित योजनाएं निर्धारित रूप से आगे बढ़ती हैं तो सिलीगुड़ी गलियारा आने वाले वर्षों में भारत की सुरक्षा संरचना का सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभर सकता है।