नई दिल्ली: एक तरफ पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चुनावी सरगर्मी तेज है, वहीं दूसरी ओर केंद्र की मोदी सरकार ने 16, 17 और 18 अप्रैल को संसद का विशेष सत्र बुलाकर महिला आरक्षण बिल में संशोधन की तैयारी कर ली है। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सरकार के इस कदम की तीखी आलोचना करते हुए इसे "लोकतंत्र की हत्या की कोशिश" बताया है।
क्या है विवाद की जड़?
साल 2023 में संसद से ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पारित हुआ था, जिसमें महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। पुराने बिल के अनुसार, यह आरक्षण अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन (Delimitation) के बाद लागू होना था। लेकिन अब केंद्र सरकार चाहती है कि 2011 की जनगणना के आधार पर ही सीटों का परिसीमन कर दिया जाए।
सोनिया गांधी के तीखे सवाल
सोनिया गांधी ने एक संपादकीय के जरिए सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं:
जनगणना में देरी: उन्होंने आरोप लगाया कि 2021 की जनगणना को जानबूझकर टाला जा रहा है ताकि जातीय जनगणना के प्रभाव को दबाया जा सके।
राज्यों के महत्व पर खतरा: सोनिया का मानना है कि 2011 के आंकड़ों पर परिसीमन करने से कई राज्यों (विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्यों) का राजनीतिक महत्व कम हो सकता है।
अचानक सत्र की क्या जरूरत? सोनिया ने पूछा कि जब दो राज्यों में चुनाव चल रहे हैं, तो इतनी जल्दबाजी क्यों? मानसून सत्र तक इंतजार क्यों नहीं किया गया?
संसदीय प्रक्रिया पर आशंका
सोनिया गांधी ने चिंता जताई कि विशेष सत्र बुलाए जाने के बावजूद सांसदों को अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि चर्चा किन विषयों पर होगी। उन्होंने आशंका जताई कि सरकार अपने बहुमत का फायदा उठाकर परिसीमन को लेकर कोई ऐसा प्रस्ताव पास कराना चाहती है जो भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
सोनिया गांधी के अनुसार, कांग्रेस चाहती थी कि महिला आरक्षण 2024 के लोकसभा चुनाव से ही लागू हो, लेकिन तब केंद्र ने इसे नहीं माना। अब बिना नई जनगणना के इसे लागू करने की कोशिशों के पीछे वह गहरी राजनीतिक साजिश देख रही हैं।