नई दिल्ली. पैगंबर मोहम्मद पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर नाज़िया इलाही खान के विरुद्ध दायर जनहित याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई से इनकार करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 32 का उपयोग तभी किया जाना चाहिए जब मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए अन्य प्रभावी कानूनी विकल्प उपलब्ध न हों। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को किसी कथित आपराधिक कृत्य या डिजिटल मंच पर प्रकाशित सामग्री से आपत्ति है तो उसके लिए दंड प्रक्रिया और सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े कानूनों के अंतर्गत पहले उपलब्ध उपाय अपनाए जाने चाहिए।
याचिका की ग्राह्यता पर अदालत ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने याचिकाकर्ता से पूछा कि जब आपराधिक कानून के तहत शिकायत दर्ज कराने और संबंधित प्राधिकारियों से कार्रवाई कराने के विकल्प मौजूद हैं, तब सीधे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा क्यों खटखटाया गया। पीठ ने यह भी संकेत दिया कि इस प्रकार की याचिकाएं संवैधानिक अधिकारों के वास्तविक संरक्षण की बजाय सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने का माध्यम नहीं बननी चाहिए। अदालत की टिप्पणी से यह स्पष्ट संदेश गया कि संवैधानिक मंच का उपयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।
पॉडकास्ट और डिजिटल मंचों के नियमन पर भी हुई चर्चा
याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि पॉडकास्ट जैसे डिजिटल माध्यमों पर पर्याप्त नियमन नहीं है और ऐसे मंचों पर आपत्तिजनक टिप्पणियां लगातार सामने आ रही हैं। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुआ। पीठ ने कहा कि यदि किसी डिजिटल सामग्री से कानून का उल्लंघन होता है तो उसके लिए निर्धारित वैधानिक तंत्र पहले से मौजूद है। अदालत ने संकेत दिया कि केवल नियमन की कमी का हवाला देकर सीधे संवैधानिक याचिका दायर करना उचित प्रक्रिया नहीं माना जा सकता।
सूचना प्रौद्योगिकी कानून और आपराधिक प्रक्रिया पर अदालत का भरोसा
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सूचना प्रौद्योगिकी कानून, भारतीय दंड कानून तथा अन्य वैधानिक प्रावधान ऐसे मामलों में कार्रवाई का पर्याप्त आधार उपलब्ध कराते हैं। यदि किसी सामग्री से धार्मिक भावनाएं आहत होने, घृणा फैलाने अथवा कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका हो तो संबंधित एजेंसियों के समक्ष शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। न्यायालय ने कहा कि वैधानिक संस्थाओं और निर्धारित प्रक्रिया को दरकिनार कर सीधे सर्वोच्च न्यायालय से हस्तक्षेप की अपेक्षा करना न्यायिक व्यवस्था की मूल भावना के अनुरूप नहीं है।
डिजिटल अभिव्यक्ति और संवैधानिक मर्यादा के बीच संतुलन की चुनौती
यह मामला एक बार फिर डिजिटल मंचों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक संवेदनशीलता और कानूनी जवाबदेही के बीच संतुलन के प्रश्न को सामने लेकर आया है। सोशल मीडिया और पॉडकास्ट जैसे माध्यमों के विस्तार के साथ विवादास्पद सामग्री से जुड़े मामलों में न्यायालयों के समक्ष नई चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन इसके साथ कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं और सामाजिक उत्तरदायित्व का पालन भी समान रूप से आवश्यक है। सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख संकेत देता है कि ऐसे मामलों में पहले वैधानिक प्रक्रिया अपनाना ही न्यायिक दृष्टि से उचित माना जाएगा।