संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का तेजी से बढ़ता उपयोग आने वाले वर्षों में ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव डाल सकता है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2030 तक AI की बिजली खपत दोगुनी हो सकती है और यह वैश्विक बिजली उपयोग का लगभग 3 प्रतिशत हिस्सा बन सकती है।
2030 तक दोगुनी हो सकती है बिजली खपत
रिपोर्ट में कहा गया है कि AI आधारित डेटा सेंटरों की बढ़ती संख्या और बड़े भाषा मॉडल्स के उपयोग से बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। अनुमान है कि 2030 तक इनकी ऊर्जा खपत इतनी बढ़ सकती है कि इससे होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ब्रिटेन जैसे देश के बराबर पहुंच सकता है।
डेटा सेंटरों को चाहिए होगा भारी मात्रा में पानी
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार AI आधारित डेटा सेंटरों को ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2030 तक डेटा सेंटरों को लगभग 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी की जरूरत पड़ सकती है, जो दुनिया की आबादी की वार्षिक पेयजल आवश्यकताओं के बराबर या उससे अधिक हो सकती है।
क्या है ‘जेवॉन्स पैरेडॉक्स’?
रिपोर्ट में AI के बढ़ते उपयोग को Jevons Paradox से जोड़ा गया है। इस सिद्धांत के अनुसार जब किसी तकनीक की दक्षता बढ़ती है और उसकी लागत घटती है, तो उसका उपयोग कम होने के बजाय और अधिक बढ़ जाता है। इस अवधारणा का अध्ययन 19वीं सदी में William Stanley Jevons ने इंग्लैंड में कोयले की खपत के संदर्भ में किया था। रिपोर्ट का कहना है कि AI तकनीक के सस्ती और अधिक सुलभ होने से इसका उपयोग और तेजी से बढ़ेगा, जिससे ऊर्जा बचत का लाभ सीमित हो सकता है।
कार्बन उत्सर्जन की भरपाई के लिए चाहिए होंगे अरबों पेड़
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में दुनिया भर के डेटा सेंटरों ने लगभग उतनी बिजली की खपत की, जितनी Saudi Arabia ने की थी। यदि 2030 तक यह खपत दोगुनी हो जाती है, तो उससे होने वाले कार्बन उत्सर्जन की भरपाई के लिए 10 वर्षों तक लगभग 6.7 अरब पेड़ लगाने की आवश्यकता पड़ सकती है।
भूमि और संसाधनों पर भी बढ़ेगा दबाव
रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि डेटा सेंटरों के विस्तार के लिए 2030 तक Mexico City के क्षेत्रफल से लगभग 10 गुना अधिक भूमि की आवश्यकता होगी। इसके साथ ही खनिज संसाधनों के दोहन और ई-वेस्ट (इलेक्ट्रॉनिक कचरे) में भी वृद्धि होने की आशंका जताई गई है।
AI अवसंरचना कुछ देशों तक सीमित
संयुक्त राष्ट्र ने डिजिटल और पर्यावरणीय असमानता को लेकर भी चिंता व्यक्त की है। रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में केवल 32 देशों में AI-विशिष्ट क्लाउड अवसंरचना उपलब्ध है और इसकी लगभग 90 प्रतिशत क्षमता अमेरिका और चीन में केंद्रित है।
जिम्मेदार AI उपयोग के लिए सुझाया रोडमैप
- रिपोर्ट में जिम्मेदार AI विकास और उपयोग के लिए कई सुझाव दिए गए हैं, जिनमें शामिल हैं:
- पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना
- ऊर्जा दक्षता को प्राथमिकता देना
- संसाधनों का सतत उपयोग
- खनिजों के स्रोत से लेकर पुनर्चक्रण तक निगरानी
- वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देना
- AI मॉडल्स के पर्यावरणीय प्रभाव की नियमित सार्वजनिक रिपोर्टिंग
संतुलित विकास की जरूरत
संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि AI तकनीक मानव विकास और नवाचार के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है, लेकिन इसके पर्यावरणीय प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए तकनीकी प्रगति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होगा।