मथुरा - श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को लेकर देशभर में तैयारियां जोरों पर हैं। 4 सितंबर को कान्हा के जन्मोत्सव के अवसर पर मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजन होंगे। ब्रजभूमि में तो जन्माष्टमी का उत्साह अलग ही नजर आता है। भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़े ब्रज के कई स्थान आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। इन्हीं में मथुरा के महावन स्थित ब्रह्मांड घाट का मंदिर भी बेहद खास है।

यहां माखन-मिश्री नहीं, लगता है मिट्टी के पेड़ों का भोग
आमतौर पर भगवान श्रीकृष्ण को माखन, मिश्री, पेड़े और तरह-तरह की मिठाइयों का भोग लगाया जाता है। लेकिन ब्रह्मांड घाट स्थित ब्रह्मांड विहारी मंदिर में भगवान को मिट्टी के पेड़ों का भोग लगाने की अनोखी परंपरा बताई जाती है। मान्यता है कि इस स्थान का संबंध श्रीकृष्ण की उस बाल लीला से है, जब उन्होंने गोप-बालकों के साथ खेलते हुए मिट्टी खा ली थी। इसी घटना की याद में यहां मिट्टी से तैयार पेड़ों का प्रसाद भगवान को अर्पित किया जाता है और बाद में इसे श्रद्धालुओं में बांटा जाता है।

जब यशोदा मैया ने कन्हैया से खुलवाया मुंह
पौराणिक कथा के अनुसार, एक दिन बाल कृष्ण ने खेलते समय मिट्टी खा ली थी। गोप-बालकों ने इसकी शिकायत माता यशोदा से की। बलराम ने भी कन्हैया के मिट्टी खाने की बात बताई। इसके बाद यशोदा मैया ने कृष्ण से मिट्टी खाने के बारे में पूछा और उनसे मुंह खोलने को कहा। मान्यता है कि जैसे ही कान्हा ने अपना मुंह खोला, यशोदा मैया उसमें सामान्य मिट्टी के बजाय अनगिनत ब्रह्मांड और देवी-देवताओं के दर्शन देखकर हैरान रह गईं।

कान्हा के मुख में दिखा पूरा ब्रह्मांड
पौराणिक मान्यता में बताया जाता है कि यशोदा मैया को बाल कृष्ण के मुख के भीतर ब्रह्मा, विष्णु और महेश समेत संपूर्ण सृष्टि के दर्शन हुए। यह दृश्य देखकर वह कुछ समय के लिए स्तब्ध रह गईं। कथा के अनुसार, यशोदा मैया ने आंखें बंद करके विचार किया कि आखिर वह क्या देख रही हैं। जब उन्होंने दोबारा आंखें खोलीं तो कन्हैया उसी तरह उनकी गोद में बैठे थे। इस लीला को श्रीकृष्ण की दिव्य शक्तियों से जोड़कर देखा जाता है।

इसी वजह से पड़ा ‘ब्रह्मांड घाट’ नाम
मान्यता है कि इसी घटना के कारण इस स्थान का नाम ब्रह्मांड घाट पड़ा। भगवान ने अपने बाल रूप में यशोदा मैया को अपने मुख के भीतर ब्रह्मांड के दर्शन कराए थे, इसलिए यहां विराजमान भगवान को ब्रह्मांड विहारी कहा जाता है। कहा जाता है कि इस घटना के बाद यशोदा मैया ने घर पहुंचकर ब्राह्मणों को बुलाया और स्वस्ति वाचन कराया। इसके साथ ही गोदान और दान-दक्षिणा भी की।
मिट्टी का प्रसाद घर ले जाते हैं श्रद्धालु
ब्रह्मांड घाट मंदिर में भगवान को अर्पित किए जाने वाले मिट्टी के पेड़ों को प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में बांटने की परंपरा भी बताई जाती है। भक्त इस प्रसाद को श्रद्धा के साथ ग्रहण करते हैं और अपने घर भी लेकर जाते हैं। मंदिर के पुजारी राजू के मुताबिक, यहां भगवान के मिट्टी खाने और यशोदा मैया को ब्रह्मांड के दर्शन होने की कथा से यह परंपरा जुड़ी हुई है। इसी वजह से यहां मिट्टी के पेड़ों का भोग लगाया जाता है।
जन्माष्टमी पर उमड़ेगा भक्तों का सैलाब
ब्रजभूमि में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दौरान देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मथुरा, वृंदावन और महावन के कृष्ण लीला स्थलों पर विशेष आयोजन होते हैं। ऐसे में ब्रह्मांड घाट स्थित यह प्राचीन मंदिर भी भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। जहां एक ओर जन्माष्टमी पर कान्हा को माखन-मिश्री और मिठाइयों का भोग लगाया जाएगा, वहीं ब्रह्मांड विहारी मंदिर की मिट्टी के पेड़ों वाली परंपरा कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी ब्रज की अनोखी धार्मिक विरासत की याद दिलाएगी।