वाशिंगटन. दुनिया एक बार फिर बड़े जलवायु संकट की दहलीज पर खड़ी नजर आ रही है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि आने वाले वर्षों में एक शक्तिशाली अल नीनो विकसित हो सकता है, जो वैश्विक स्तर पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। अनुमान जताया जा रहा है कि वर्ष 2027 तक यह स्थिति ‘सुपर अल नीनो’ का रूप ले सकती है, जिससे कई देशों में सूखा और खाद्य संकट गहरा सकता है।
इतिहास की भयावह घटना से तुलना
करीब 150 वर्ष पहले 1877-78 में आए अल नीनो को इतिहास की सबसे विनाशकारी जलवायु घटनाओं में गिना जाता है। उस समय लंबे सूखे, फसल बर्बादी और अकाल के कारण दुनिया के कई हिस्सों में भारी जनहानि हुई थी। विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाला अल नीनो उस घटना से भी अधिक गंभीर साबित हो सकता है।
प्रशांत महासागर में बढ़ता तापमान बना संकेत
वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रशांत महासागर की सतह का तापमान तेजी से बढ़ रहा है, जो अल नीनो के बनने का प्रमुख संकेत होता है। हाल के जलवायु मॉडल इस वृद्धि को असामान्य रूप से तेज दिखा रहे हैं। यदि यह रुझान जारी रहता है, तो एक अत्यधिक शक्तिशाली ‘मेगा अल नीनो’ की स्थिति बन सकती है।
वैश्विक मौसम प्रणाली पर पड़ेगा व्यापक असर
अल नीनो की तीव्रता बढ़ने से वैश्विक मौसम प्रणाली में भारी बदलाव आ सकता है। इससे कई क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी, वर्षा की कमी और सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। यह प्रभाव विशेष रूप से कृषि पर पड़ेगा, जिससे खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट और आपूर्ति संकट की संभावना बढ़ जाएगी।
भारत पर भी दिख सकता है असर
भारत जैसे कृषि प्रधान देश पर इस संभावित संकट का गहरा प्रभाव पड़ सकता है। मानसून कमजोर होने की स्थिति में खेती प्रभावित होगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा। इसके साथ ही तापमान में वृद्धि से जनजीवन और स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
जलवायु परिवर्तन से और बढ़ेगा खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा जलवायु परिवर्तन के साथ यदि अल नीनो की स्थिति जुड़ती है, तो इसका प्रभाव और अधिक गंभीर हो सकता है। इससे वैश्विक तापमान नए रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है, जो पर्यावरण और मानव जीवन दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण होगा।
सतर्कता और तैयारी की आवश्यकता
इस संभावित संकट को देखते हुए वैज्ञानिकों ने सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को पहले से तैयारी करने की सलाह दी है। जल प्रबंधन, खाद्यान्न भंडारण और आपदा प्रबंधन योजनाओं को मजबूत करना समय की मांग है, ताकि इस तरह की प्राकृतिक आपदा के प्रभाव को कम किया जा सके।