निकाह मुताह, जिसे अरबी में ‘मुतअ’ तथा ईरान में ‘सीगेह’ भी कहा जाता है, एक निश्चित अवधि के लिए किया जाने वाला वैवाहिक अनुबंध माना जाता है। इस व्यवस्था में विवाह से पहले ही पुरुष और महिला आपसी सहमति से यह तय कर लेते हैं कि उनका वैवाहिक संबंध कितने समय तक रहेगा। यह अवधि कुछ घंटों, कुछ दिनों, महीनों अथवा अन्य सहमत समय तक हो सकती है। अनुबंध की अवधि समाप्त होते ही यह संबंध स्वतः समाप्त हो जाता है और सामान्यतः अलग से तलाक की प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होती। विवाह के समय महिला के लिए निर्धारित मेहर देना इस व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा माना जाता है।
धार्मिक मतभेदों के कारण बना विवाद का विषय
निकाह मुताह इस्लामी जगत में सर्वमान्य व्यवस्था नहीं है। शिया इस्लामी परंपरा में इसे कुछ परिस्थितियों में धार्मिक रूप से वैध माना जाता है और विशेष रूप से ईरान सहित कुछ शिया-बहुल क्षेत्रों में इसे कानूनी मान्यता भी प्राप्त है। दूसरी ओर अधिकांश सुन्नी इस्लामी विद्वान और धार्मिक संस्थाएं इसे स्वीकार नहीं करतीं तथा इसे निषिद्ध मानती हैं। यही कारण है कि इस विषय पर लंबे समय से धार्मिक व्याख्याओं और मतभेदों की चर्चा होती रही है। विभिन्न देशों में स्थानीय कानून और धार्मिक परंपराओं के अनुसार इसकी स्थिति अलग-अलग देखने को मिलती है।
किन देशों में मिलता है कानूनी या सामाजिक आधार
निकाह मुताह का सबसे अधिक उल्लेख ईरान में मिलता है, जहां इसे ‘सीगेह’ के नाम से कानूनी मान्यता प्राप्त है और कुछ मामलों में इसका औपचारिक पंजीकरण भी कराया जाता है। इराक के शिया बहुल क्षेत्रों तथा लेबनान के कुछ शिया समुदायों में भी यह धार्मिक परंपरा के रूप में स्वीकार की जाती है। इसके अतिरिक्त बहरीन, यमन, पाकिस्तान और भारत के कुछ शिया समुदायों में भी ऐसे विवाहों के उदाहरण समय-समय पर सामने आते रहे हैं। हालांकि इन देशों में इसकी सामाजिक स्वीकृति, कानूनी प्रक्रिया और व्यवहारिक स्वरूप एक-दूसरे से भिन्न हो सकते हैं।
संतान, अधिकार और कानूनी पहलुओं की व्यवस्था
धार्मिक व्याख्याओं के अनुसार यदि निकाह मुताह से संतान जन्म लेती है, तो उसे वैध संतान माना जाता है तथा उसे पिता से संबंधित अधिकार प्राप्त हो सकते हैं। हालांकि उत्तराधिकार, संपत्ति और अन्य पारिवारिक अधिकारों से जुड़े नियम विभिन्न देशों के कानूनों तथा स्थानीय धार्मिक व्यवस्थाओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी भी देश में इस व्यवस्था की कानूनी स्थिति वहां लागू व्यक्तिगत कानून और न्यायिक प्रावधानों पर निर्भर करती है।
सामाजिक स्वीकृति अब भी सीमित
यद्यपि कुछ क्षेत्रों में निकाह मुताह धार्मिक रूप से मान्य है, फिर भी अनेक पारंपरिक परिवार इसे सामाजिक दृष्टि से सहज स्वीकार नहीं करते। विशेषकर अविवाहित युवतियों के मामले में कई परिवार इस व्यवस्था से दूरी बनाए रखते हैं। वहीं कुछ समाजों में विधवा अथवा तलाकशुदा महिलाओं के संदर्भ में अपेक्षाकृत अधिक लचीलापन देखा जाता है। सामाजिक प्रतिष्ठा, पारिवारिक परंपराएं और स्थानीय सांस्कृतिक मान्यताएं इस व्यवस्था की स्वीकार्यता को काफी हद तक प्रभावित करती हैं।
आलोचनाए और मानवाधिकार संबंधी चिंताए
निकाह मुताह को लेकर सबसे अधिक विवाद इसके संभावित दुरुपयोग को लेकर सामने आता है। अनेक महिला अधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कुछ मामलों में आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं का शोषण होने की आशंका रहती है। आलोचकों का तर्क है कि यदि इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल अल्पकालिक व्यक्तिगत संबंध बनाना रह जाए, तो इससे विवाह संस्था की गरिमा और महिलाओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर इसके समर्थकों का कहना है कि यह दोनों वयस्क पक्षों की सहमति पर आधारित धार्मिक अनुबंध है और इसे उसकी मूल धार्मिक अवधारणा के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। इस विषय पर विभिन्न देशों, धार्मिक विद्वानों और सामाजिक विशेषज्ञों के बीच मतभेद आज भी बने हुए हैं।