उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मामला 32 साल बाद सामने आया है जिसने एक बार फिर प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारी के अनुसार 2 सितंबर 1994 को पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर झूला घर शहीद स्थल पर आंदोलन चल रहा था। इस दौरान निहत्थे राज्य आंदोलनकारियों पर पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में 6 आंदोलनकारियों के साथ एक पुलिस अधिकारी उमाकांत त्रिपाठी भी शहीद हो गए थे।
राज्य आंदोलनकारियों की मांग
इस घटना के बाद लंबे समय तक राज्य आंदोलनकारियों द्वारा यह मांग की जाती रही कि उमाकांत त्रिपाठी को भी शहीद का दर्जा दिया जाए। हालांकि 32 वर्षों तक यह स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आ सकी कि उन्हें यह दर्जा मिला है या नहीं। इसी बीच शासन-प्रशासन की निष्क्रियता के चलते स्थिति भ्रमपूर्ण बनी रही।
अब जाकर राज्य आंदोलनकारियों और Uttarakhand Sangharsh Samiti द्वारा की गई लगातार खोजबीन के बाद यह स्पष्ट हुआ है कि सरकार द्वारा वर्ष 1995 में ही उमाकांत त्रिपाठी को शहीद का दर्जा प्रदान किया जा चुका था। इतना ही नहीं उनका नाम दिल्ली स्थित शिलापट्ट पर शहीदों की सूची में भी दर्ज है।
खुलासे के बाद नाराजगी
इस खुलासे के बाद राज्य आंदोलनकारियों में नाराजगी देखने को मिल रही है। उनका कहना है कि यदि यह जानकारी पहले से दर्ज थी तो फिर इतने वर्षों तक इसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया। आंदोलनकारियों ने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे गंभीर लापरवाही का परिणाम बताया है।
यह मामला अब एक बार फिर उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं पर चर्चा का विषय बन गया है।