नई दिल्ली से जारी निर्देशों के बाद निजी अस्पतालों में इलाज की दरों को लेकर पारदर्शिता बढ़ाने की पहल तेज हुई है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यों से कहा है कि निजी अस्पतालों में विभिन्न चिकित्सा सेवाओं की कीमतें स्पष्ट रूप से प्रदर्शित की जाएं, ताकि मरीजों और उनके परिजनों को इलाज से जुड़े खर्च की जानकारी मिल सके। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने राज्यों को पत्र लिखकर निर्देशों को जल्द लागू करने का आग्रह किया है।स्वास्थ्य सेवाएं केंद्र और राज्यों की साझा जिम्मेदारी होने के कारण राज्यों से इस दिशा में कार्रवाई करने को कहा गया है। पश्चिम बंगाल में भी स्वास्थ्य आयोग इस मुद्दे पर आगे की व्यवस्था पर विचार कर रहा है।
डिस्प्ले बोर्ड पर दिखानी होंगी इलाज की दरें
केंद्रीय निर्देशों के मुताबिक, निजी अस्पतालों को अपने परिसर में ऐसे डिस्प्ले बोर्ड लगाने होंगे, जिन पर विभिन्न चिकित्सा सेवाओं की दरें स्पष्ट रूप से लिखी हों। बोर्ड की जगह, अक्षरों का आकार और रंग इस तरह होना चाहिए कि मरीजों के परिजन आसानी से जानकारी पढ़ सकें।इस पहल का उद्देश्य मरीजों को इलाज पर होने वाले खर्च के बारे में पहले से जानकारी देना और बिलिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाना है।
2012 के कानून के बावजूद क्यों उठ रहे सवाल?
निजी अस्पतालों में इलाज की लागत और बिलिंग को लेकर शिकायतें नई नहीं हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2012 में क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट कानून के तहत चिकित्सा सेवाओं की दरों की जानकारी उपलब्ध कराने से संबंधित प्रावधानों पर जोर दिया गया था। अब केंद्र ने राज्यों से इन प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने का आग्रह किया है।पश्चिम बंगाल में वर्ष 2017 में वेस्ट बंगाल क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट कानून लागू हुआ था। इसके तहत निजी अस्पतालों की सेवाओं से संबंधित शिकायतों की सुनवाई के लिए स्वास्थ्य आयोग बनाया गया। इसके बावजूद अस्पतालों के बिल और मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
दवाओं और मेडिकल सामान की कीमतों पर भी सवाल
निजी अस्पतालों में इलाज के खर्च को लेकर बहस केवल डॉक्टरों की फीस या अस्पताल के पैकेज तक सीमित नहीं है। दवाओं, सिरिंज, सर्जिकल ग्लव्स और अन्य चिकित्सा सामग्रियों की कीमतें भी चर्चा में हैं।रिपोर्ट में दिए गए उदाहरणों के मुताबिक, थोक बाजार में 19 रुपये की एक जोड़ी सर्जिकल ग्लव्स की कीमत कुछ निजी अस्पतालों में 80 रुपये बताई गई। वहीं, 21.72 रुपये की सिरिंज का बिल 199.49 रुपये और 15.55 रुपये की राइल्स ट्यूब का एमआरपी 86 रुपये बताया गया। ये उदाहरण संबंधित रिपोर्ट में बताए गए दामों पर आधारित हैं; इन्हें सभी अस्पतालों की दरें नहीं माना जाना चाहिए।महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन के आयुक्त तुकाराम मुंडे ने भी सितंबर में सोशल मीडिया पर अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली कुछ सामग्रियों की कीमतों को लेकर सवाल उठाए थे।
कर्नाटक और उत्तर प्रदेश के मॉडल पर विचार
रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक में 1 अक्टूबर को जारी निर्देश में निजी अस्पतालों से दवाओं और चिकित्सा सामग्रियों की खरीद कीमत तथा मरीजों से वसूली जाने वाली कीमत का विवरण बिल में दर्ज करने को कहा गया। इसका मकसद यह स्पष्ट करना है कि अस्पताल किसी सामान को किस कीमत पर खरीदते हैं और मरीज से कितनी राशि लेते हैं।पश्चिम बंगाल स्वास्थ्य आयोग के सदस्य डॉ. नारायण बंद्योपाध्याय के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह की व्यवस्था पर कदम उठाए गए हैं। आयोग अब विचार कर रहा है कि ऐसी व्यवस्था बंगाल में भी लागू की जा सकती है या नहीं।
स्वास्थ्य आयोग ने जताई व्यवस्था में सुधार की जरूरत
नवगठित पश्चिम बंगाल स्वास्थ्य आयोग ने मंगलवार को अवकाशप्राप्त न्यायाधीश विश्वजीत बसु की अध्यक्षता में पहली सुनवाई की। इस दौरान सात मामलों की सुनवाई हुई।आयोग के अध्यक्ष विश्वजीत बसु ने कहा कि निजी अस्पतालों की सेवाओं को लेकर शिकायतें कम करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन व्यवस्था में अभी और सुधार की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर आयोग अपनी जिम्मेदारी निभाएगा।
क्या पारदर्शी बिलिंग से मरीजों को मिलेगी राहत?
डिस्प्ले बोर्ड पर दरें दिखाना और बिल में दवाओं तथा चिकित्सा सामग्रियों की खरीद-बिक्री की कीमतों का विवरण देना पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में कदम हो सकता है। हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि राज्य इन निर्देशों को किस तरह लागू करते हैं और अस्पताल नियमों का कितना पालन करते हैं।ऑल इंडिया ड्रग्स एक्शन नेटवर्क की संयुक्त संयोजक मालिनी ऐसोला ने भी कहा कि केवल पैकेज की कीमत बताने से मरीजों के परिजनों के लिए अलग-अलग सेवाओं के शुल्क की तुलना करना मुश्किल होता है। उनके मुताबिक, राज्यों को निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली को नियमों के दायरे में लाने के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे।अब सवाल यह है कि क्या नई व्यवस्था से मरीजों को इलाज के खर्च का स्पष्ट हिसाब मिल पाएगा और निजी अस्पतालों के बिल को लेकर शिकायतों में कमी आएगी।