कोलकाता: दुर्गा पूजा के आखिरी दिन यानी विजयादशमी पर बंगाल की गलियों में ढाक की थाप कुछ अलग ही एहसास कराती है। मां दुर्गा की विदाई के समय ढाकिए जब खास बोल बजाते हैं, तो माहौल में उत्सव के साथ बिछड़ने का दुख भी घुल जाता है। ‘ठाकुर थाकबे कतोक्खण, ठाकुर जाबे बिसर्जन’ यानी मां आखिर कितनी देर रहेंगी, उन्हें विसर्जन के लिए जाना ही होगा- यह बोल बंगाल की दुर्गा पूजा का जाना-पहचाना हिस्सा है। लेकिन इस धुन की शुरुआत को लेकर चूड़ामणि दत्त की एक रोचक कहानी प्रचलित है।
शोभाबाजार के धनी परिवार से जुड़ा है किस्सा
पुराने कोलकाता के शोभाबाजार इलाके में दत्त परिवार अपनी संपन्नता के लिए जाना जाता था। प्रचलित कथा में चूड़ामणि दत्त को एक धनी और दानशील व्यक्ति बताया गया है, जिन्हें अपनी दौलत पर काफी गर्व था। उनके जीवन से जुड़ा एक किस्सा बताता है कि किस तरह मृत्यु के डर और अपनी छवि को लेकर उनकी चिंता ने एक अनोखे आयोजन का रूप ले लिया।
कलम से उंगली कटी तो घर लौट आए चूड़ामणि
कहानी के मुताबिक, एक दिन चूड़ामणि दत्त अपने दफ्तर में खाग की कलम तैयार कर रहे थे। इसी दौरान उनकी उंगली कट गई और खून निकलने लगा। इस छोटी-सी चोट से वह घबरा गए और पालकी मंगवाकर तुरंत घर लौट आए। घर पहुंचते ही उन्होंने परिवार की महिलाओं को स्नान और भोजन जैसे जरूरी काम निपटाने को कहा। इसके बाद अपने दीवान को बुलाकर 100 ढाकियों की व्यवस्था करने का आदेश दिया।
खाट पर लेटकर ढाकियों को दिया नया बोल
लोककथा के अनुसार, चूड़ामणि दत्त ने एक खाट पर बिस्तर बिछवाया और उस पर लेट गए। उन्होंने अपने शरीर पर दुर्गा, काली, राम और हरि के नाम लिखवाए। इसके बाद ढाकियों से कहा कि वे सामान्य विसर्जन की धुन न बजाकर उनके बताए बोल पर ताल दें।
कहानी में उनके बोल कुछ इस तरह बताए गए हैं- ‘दुनिया जिनिया चूड़ा, यम जिनिते जाय।’ इसका आशय था कि चूड़ामणि दुनिया को जीतने के बाद अब यमराज को जीतने जा रहे हैं। ढाकियों ने एक साथ बजाना शुरू किया और चूड़ामणि तालियां बजाते हुए इन पंक्तियों को दोहराने लगे।
गंगा घाट पर खत्म हुआ जुलूस
कथा के मुताबिक, खाट पर लेटे चूड़ामणि दत्त का जुलूस शोभाबाजार से गंगा घाट की ओर रवाना हुआ। रास्ते में उन्होंने शोभाबाजार के राजा नवकृष्ण देव को भी आवाज दी। घाट पहुंचने पर उन्होंने खाट को पानी में उतारने का आदेश दिया। इसके बाद गंगाजल सिर पर डालते हुए यमराज को चुनौती देने की बात कही जाती है। लोककथा के अनुसार, इसी के तुरंत बाद उनका निधन हो गया।
‘ठाकुर थाकबे कतोक्खण’ के बोल में छिपा है विदाई का भाव
चूड़ामणि दत्त की कहानी में बताए गए बोल और आज विसर्जन के दौरान सुनाई देने वाले ‘ठाकुर थाकबे कतोक्खण, ठाकुर जाबे बिसर्जन’ के बोल अलग हैं। इसलिए दोनों को एक ही गीत या धुन मानने से पहले सावधानी जरूरी है। फिर भी, यह कथा बंगाल में विसर्जन के ढाक को लेकर प्रचलित सांस्कृतिक किस्सों में अपनी जगह रखती है।
आज ढाक की थाप मां दुर्गा की विदाई का अभिन्न हिस्सा है। प्रतिमा के विसर्जन के साथ पूजा का समापन जरूर होता है, लेकिन ढाक की गूंज भक्तों के मन में अगले साल मां के लौटने की उम्मीद जगा देती है। चूड़ामणि दत्त से जुड़ी कहानी भी इसी पुरानी सांस्कृतिक विरासत की एक दिलचस्प कड़ी है।