कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है और इसी के साथ सियासी हलचल तेज हो गई है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक बार फिर सत्ता में वापसी कर पाएंगी या इस बार सत्ता परिवर्तन का रास्ता खुलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे शासन के बाद इस बार मुकाबला पहले से कहीं ज्यादा कठिन हो गया है।
भ्रष्टाचार के आरोप बने सबसे बड़ा सिरदर्द
राज्य सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप इस चुनाव में अहम मुद्दा बनकर उभरे हैं। शिक्षक भर्ती, राशन और कोयला जैसे मामलों में कई बड़े नेताओं पर कार्रवाई हुई है। जांच एजेंसियों की सक्रियता ने सरकार की छवि को प्रभावित किया है, जिससे आम जनता के बीच विश्वास में कमी देखी जा रही है।
महिला सुरक्षा पर उठे सवाल
महिलाएं लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस का मजबूत आधार रही हैं, लेकिन हाल की घटनाओं ने इस समर्थन को झटका दिया है। संदेशखाली जैसे मामलों ने विपक्ष को सरकार पर हमला बोलने का मौका दिया है। खासकर भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रही है।
एंटी-इन्कम्बेंसी का बढ़ता असर
लगातार तीन कार्यकाल पूरे करने के बाद सरकार के खिलाफ नाराजगी बढ़ना स्वाभाविक माना जा रहा है। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के व्यवहार और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर शिकायतें सामने आई हैं, जिससे सत्ता विरोधी लहर मजबूत होती दिख रही है।
भाजपा का उभार और बदलता समीकरण
राज्य की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। 2021 के चुनाव में मजबूत प्रदर्शन के बाद पार्टी ने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत किया है। धार्मिक और वैचारिक मुद्दों ने चुनावी मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।
युवाओं में बढ़ती नाराजगी
रोजगार और भर्ती घोटालों के कारण युवाओं में असंतोष बढ़ा है। औद्योगिक विकास की धीमी गति और सीमित अवसरों ने शिक्षित वर्ग को विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित किया है। हालांकि सरकारी योजनाएं अभी भी गरीब वर्ग को आकर्षित कर रही हैं, लेकिन युवा वोटर बदलाव की ओर झुकता नजर आ रहा है।
क्या फिर पलटेंगी बाजी?
ममता बनर्जी को एक मजबूत और संघर्षशील नेता माना जाता है, जो कठिन परिस्थितियों में भी वापसी करने की क्षमता रखती हैं। अब सबकी नजर चुनाव नतीजों पर है, जो तय करेंगे कि क्या ‘दीदी’ एक बार फिर अपनी पकड़ बनाए रखेंगी या बंगाल की राजनीति में नया अध्याय शुरू होगा।