कोलकाता। साल 2024 में उत्तर 24 परगना के संदेशखाली से सामने आए आरोपों ने पूरे देश की राजनीति को हिला दिया था। स्थानीय महिलाओं ने तृणमूल कांग्रेस से जुड़े नेताओं पर यौन उत्पीड़न, धमकी और जमीन कब्जाने जैसे गंभीर आरोप लगाए। इस घटना ने राज्य सरकार की कार्यशैली और कानून व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए। विपक्ष ने इसे महिलाओं की सुरक्षा में प्रशासन की विफलता बताते हुए लगातार आंदोलन चलाया। ग्रामीण क्षेत्रों में इस मामले का गहरा असर देखने को मिला और महिला मतदाताओं के बीच नाराजगी तेजी से बढ़ी।
आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामला बना राष्ट्रीय मुद्दा
कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला ट्रेनी डॉक्टर के साथ दुष्कर्म और हत्या की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस घटना के बाद बंगाल ही नहीं बल्कि देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। महिला सुरक्षा को लेकर ममता सरकार पर चौतरफा हमले हुए। लंबे समय तक महिलाओं के समर्थन को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानने वाली टीएमसी के लिए यह मामला राजनीतिक रूप से बेहद नुकसानदायक साबित हुआ। विपक्ष ने इसे सरकार की प्रशासनिक असफलता और बिगड़ती कानून व्यवस्था का प्रतीक बताया।
शिक्षक भर्ती घोटाले ने युवाओं का भरोसा तोड़ा
पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग भर्ती घोटाले ने लाखों युवाओं के बीच भारी नाराजगी पैदा कर दी। शिक्षक और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्तियों में कथित भ्रष्टाचार और पैसों के लेनदेन के आरोपों ने सरकार की छवि को गहरी चोट पहुंचाई। पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी समेत कई नेताओं के नाम जांच में सामने आने के बाद यह मामला और ज्यादा गंभीर हो गया। बेरोजगार युवाओं और शिक्षित वर्ग के बीच यह धारणा बनने लगी कि सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता खत्म हो चुकी है।
शारदा और नारदा मामलों से बढ़ी भ्रष्टाचार की धारणा
शारदा चिटफंड घोटाला और नारदा स्टिंग ऑपरेशन लंबे समय तक बंगाल की राजनीति में चर्चा का केंद्र बने रहे। शारदा घोटाले में हजारों लोगों की जमा पूंजी डूबने के बाद जनता के बीच भारी असंतोष पैदा हुआ था। वहीं नारदा स्टिंग में नेताओं के कथित वीडियो सामने आने से विपक्ष को सरकार को घेरने का बड़ा मौका मिला। इन मामलों ने तृणमूल कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के आरोपों को और मजबूत कर दिया और जनता के बीच सरकार की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।
चुनावी हिंसा और सिंडिकेट राज बना बड़ा मुद्दा
पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का मुद्दा लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा बना रहा। विपक्षी दलों ने टीएमसी कार्यकर्ताओं पर हमले, बूथ कब्जाने और राजनीतिक दबाव बनाने जैसे आरोप लगाए। इसके साथ ही ग्रामीण इलाकों में “कट मनी” और “सिंडिकेट राज” की शिकायतें भी लगातार सामने आती रहीं। आम लोगों के बीच यह धारणा बनने लगी कि स्थानीय स्तर पर सत्ता का दुरुपयोग बढ़ता जा रहा है। बीजेपी ने इन्हीं मुद्दों को अपने चुनाव प्रचार का बड़ा हथियार बनाया।
अल्पसंख्यक वोट बैंक में भी आई दरार
टीएमसी का सबसे मजबूत आधार माने जाने वाले मुस्लिम वोट बैंक में इस बार बिखराव देखने को मिला। कई क्षेत्रों में नई क्षेत्रीय पार्टियों और अलग-अलग मुस्लिम नेताओं की सक्रियता ने चुनावी समीकरण बदल दिए। कांग्रेस, एआईएमआईएम और अन्य दलों ने भी अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की। इसका असर यह हुआ कि टीएमसी को मिलने वाला पारंपरिक समर्थन पहले जैसा एकतरफा दिखाई नहीं दिया।
सत्ता विरोधी लहर ने बदल दी राजनीतिक तस्वीर
वर्ष 2011 से लगातार सत्ता में रहने के बाद ममता सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल भी धीरे-धीरे मजबूत होता गया। युवा मतदाता रोजगार, उद्योग और विकास जैसे मुद्दों पर बदलाव की उम्मीद कर रहे थे। लंबे शासन के कारण प्रशासनिक सुस्ती और जनता की बढ़ती अपेक्षाओं के बीच दूरी भी बढ़ने लगी। यही वजह रही कि 2026 का चुनाव केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं बल्कि बदलाव की मांग का प्रतीक बन गया।