कोलकाता :बंगाली सिनेमा और टेलीविजन उद्योग (टॉलीवुड) में पिछले एक दशक से चले आ रहे निर्माताओं, निर्देशकों, फेडरेशन और तकनीशियनों के बीच के विवाद को सुलझाने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। 13 और 22 जुलाई 2026 को नंदन फिल्म सेंटर में सूचना और संस्कृति विभाग की पहल पर उद्योग के सभी पक्षों के साथ दो महत्वपूर्ण बैठकें आयोजित की गईं। इन बैठकों में निर्माता संगठनों, तकनीशियन गिल्ड, फेडरेशन, निर्देशकों, स्टूडियो प्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों की मौजूदगी में टॉलीवुड की दीर्घकालिक प्रशासनिक व ढांचागत समस्याओं के समाधान के लिए 16 प्रस्तावों का एक संयुक्त खाका तैयार किया गया है।
2017 से 2025: विवाद और कानूनी लड़ाई का लंबा इतिहास
बंगाली फिल्म उद्योग में काम करने के नियमों और गिल्ड व फेडरेशन के अधिकारों को लेकर विवाद नया नहीं है।
- 2017 (सुप्रीम कोर्ट का निर्देश): डब किए गए हिंदी धारावाहिकों के प्रसारण को रोकने को लेकर शुरू हुआ विवाद भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) और बाद में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि उद्योग को नुकसान पहुंचाने वाला कोई भी सामूहिक कदम 'प्रतिस्पर्धा-विरोधी' (anti-competitive) माना जाएगा। उसी वर्ष फिल्म 'चालबाज' की शूटिंग के दौरान विदेश में कितने तकनीशियन जाएंगे, इसे लेकर निर्माताओं और फेडरेशन के बीच विवाद चरम पर पहुंच गया था।
- 2018 (मानदेय और काम के घंटे): बकाया भुगतान और रोजाना 14 घंटे से अधिक काम कराए जाने के विरोध में शूटिंग ठप हो गई थी। बाद में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हस्तक्षेप से मामला सुलझा था।
- 2024-25 (निर्देशक बनाम तकनीशियन): साल 2024 में निर्देशक राहुल मुखर्जी पर प्रतिबंध लगाने को लेकर निर्देशकों ने काम बंद कर दिया था और शूटिंग ठप हो गई थी। इसके बाद 2025 में कई स्वतंत्र निर्देशकों (जैसे बिदुला भट्टाचार्य) ने काम की स्वतंत्रता की मांग को लेकर कोलकाता उच्च न्यायालय का रुख किया। उच्च न्यायालय ने फेडरेशन को निर्देश दिया कि वह निर्देशकों के स्वतंत्र कामकाज में हस्तक्षेप न करे।
2026 की सरकारी पहल: 16 प्रमुख प्रस्ताव
नंदन में हुई बैठकों में स्वीकृत मुख्य प्रस्तावों का सारांश:
- वर्किंग कमेटी और फेडरेशन ऑफिस: राज्य सरकार, निर्माताओं और गिल्ड के प्रतिनिधियों को मिलाकर एक 'वर्किंग कमेटी' गठित करने का प्रस्ताव है।
- मानदेय सुरक्षा पर सख्त कदम: यदि लाइन प्रोड्यूसर या निर्माता पैसे रोकते हैं, तो उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। भुगतान न करने वाले लाइन प्रोड्यूसर को भविष्य में काम न देने के नीतिगत फैसले पर सहमति बनी है।
- काम का विस्तृत SOP: लंच और डिनर का समय, रात की शूटिंग के बाद घर लौटने के लिए परिवहन सुविधा, सुरक्षित वातावरण और सम्मानजनक व्यवहार के लिखित नियम बनाए जा रहे हैं।
- वेस्ट बंगाल फिल्म पॉलिसी और सिंगल विंडो क्लीयरेंस: राज्य सरकार एक निश्चित शूटिंग नीति बनाएगी और अनुमति की जटिलता को कम करने के लिए 'सिंगल विंडो डिजिटल प्लेटफॉर्म' शुरू किया जाएगा।
- सिनेमाघरों में शो की समस्या: विकल्प के तौर पर सरकारी सभागारों और थिएटरों में नियमित रूप से बंगाली फिल्में दिखाने की संभावना तलाशी जा रही है।
- तकनीशियनों की सामाजिक सुरक्षा: कर्मचारियों के लिए आयुष्मान भारत या अन्य स्वास्थ्य बीमा और प्रोविडेंट फंड (EPFO) लागू करने पर चर्चा का निर्णय लिया गया है।
- डिजिटल डेटाबेस और पारदर्शिता: तकनीशियनों की ऑनलाइन रजिस्ट्री, शिकायत निवारण के लिए मोबाइल ऐप और निर्माताओं के लिए एक नया 'प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन' गठित करने की पहल की जा रही है।
क्रियान्वयन ही असली परीक्षा: क्या सुलझ पाएंगे मौलिक सवाल?
सरकारी दस्तावेजों में उल्लेख किया गया है कि अगले तीन महीनों में इन निर्णयों की प्रगति की समीक्षा की जाएगी। हालांकि, उद्योग जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही ये प्रस्ताव कागजों पर सकारात्मक दिखते हैं, लेकिन इनकी सफलता पूरी तरह से व्यावहारिक क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। क्या निर्देशक को अपनी रचनात्मक स्वतंत्रता मिलेगी, क्या निर्माता का निवेश सुरक्षित रहेगा और क्या तकनीशियनों को उनका उचित मानदेय, सुरक्षा व सम्मान समय पर मिल सकेगा—इन तीनों पहलुओं का संतुलन ही तय करेगा कि 2026 का यह सरकारी कदम टॉलीवुड की कार्य संस्कृति में कितना वास्तविक बदलाव ला पाता है।