इंदौर में दो दशक पहले तक 30 से ज्यादा सिंगल स्क्रीन टॉकीज थे। अब स्थिति बिल्कुल अलग है। मल्टीप्लेक्क के दौर में शहर में करोड़ों की लागत से ओपन एयर ड्राइव इन थिएटर भी बनकर तैयार है। इस सबके बीच इंदौर के एक पुस्तक व्यवसायी ने सिंगल स्क्रीन सिनेमा की यादों को धरोहर के रुप में संजोकर रखा है। व्ववसायी का दावा है यह भारत का पहला सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर म्यूजियम है। इस म्यूजियम में इंदौर की 30 से अधिक टॉकिज से जुड़े फोटो, टिकट, स्लाइड, प्रोजेक्टर, पोस्टर्स सहित सभी चींजे रखी गई हैं। म्यूजियम का टिकट मात्र 1 रुपये 60 पैसे है। दर्शक यहां सिंगल स्क्रीन सिनेमा की यादों में खो जाते हैं।

पुरानी यादों को सहेजने का शौक 1983 से था

पुस्तक व्यवसायी विनोद जोशी को सिनेमा की पुरानी यादों को सहेजने का शौक 1983 से था। लेकिन असल जुनूनू 2015 में सवार हुआ। जोशी ने बताया, इंदौर में 1980 के दशक में 30 से ज्याका टॉकीज थे। समय तेजी से बदला और फिर चैनल्स, कैसेटस, कैसेट, सीडी, फ्लॉपी, पेन ड्राइव का दौर आ गया। इसी कड़ी में मल्टीप्लेक्स और जब ओटीटी प्लेटफार्म चलन में है। इस बीच शहर के कई टॉकीज बंद होकर वहां कॉम्प्लेक्स बन गए।
फोटो के आधार पर मॉडल बनवाना शुरु किया
जोशी ने पुराने के फिल्मों के विज्ञापन, अखबार में छपने वाला सिनेमाघरों का कॉलम, छपता, रील, प्रोजक्टर, स्लाइड आदि को सहेजना शुरु किया। इसी कड़ी में जो टॉकीज अब नहीं हैं। उनके पुराने फोटो के आधार पर मॉडल बनवाना शुरु किया। इस तरह उन्होंने काफी कलेक्शन किया और 2020 में कृष्ण विहार कॉलोनी, छोटा बांगड़दा में किराए का मकान लेकर इंदौर सिनेमाघर म्यूजियम शुरु किया। म्यूजियम में पुराने जमाने के वाघमारे के बाड़े का भी जिक्र है।
उस दौरान लोअर टिकिट 1 रुपये 60 पैसे मिलती थी
पुराने लोगों को याद है कि उस दौरान लोअर टिकिट 1 रुपये 60 पैसे मिलती थी। जोशी ने अपने म्यूजियम की टिकट दर भी इतनी ही रखी है। अब चूंकि पैसे चलन में नहीं हैं, इसलिए लोग यो तो ऑनलाइन या फिर राउंड फिगर में पेमेंट कर देते हैं। इस थिएटर को देखने और समझने के लिए कम से कम आधा घंटा लगता है। कलेक्शन में किस साल, किस महीने में, किस टॉकीज में कौन सी पिक्चर चली, उसके विज्ञापन, पोस्टर्स कैसे होते थे वह सब शामिल है। बता दें, सिंगल स्क्रीन का दूसरा टिकट 3 रुपए 20 पैसे का, फिर बालकनी 5 रुपए और बॉक्स 7 रुपए में मिलती थी।
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नई फिल्मों के ट्रेलर्स की स्लाइड आदि भी दिखाते हैं
संग्रहालय में प्रोजेक्टर से परदे पर कैसे फिल्म दिखती थी, उसे वे खुद प्रोजेक्टर चलाकर दिखाते हैं। तब इंटरवल में विज्ञापन के रूप में कौन-कौन सी स्लाइड चलती थी। नई फिल्मों के ट्रेलर्स की स्लाइड आदि भी दिखाते हैं। पुराने श्रीकृष्ण टॉकीज का भी मॉडल बनवाया है। ऐसे ही अन्य टॉकीजों के भी मॉडल हैं। उनका कहना है कि करोड़ों की लागत का ओपन एयर ड्राइव इन थिएटर लोगों के लिए नया है, लेकिन अगर गहराई में जाएं तो यह पुराने दौर का ही ओपन थिएटर है। जब टॉकीज नहीं थे और लोग खुली हवा में फिल्म देखते थे। जोशी के पास 1917 से लेकर 2000 के दशक तक का कलेक्शन है।
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