पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि राज्य की सरकारी प्रयोगशालाओं में इंजेक्टेबल दवाओं की जांच की सुविधा मौजूद नहीं है। सरकार दूसरे राज्यों पर निर्भर है, जहां सैंपल भेजने के बाद रिपोर्ट आने में दो से तीन महीने लग जाते हैं।पूर्व सीएम कमलनाथ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा मध्यप्रदेश में जो हो रहा है, वह किसी प्रशासनिक चूक का मामला नहीं है, बल्कि जनता की जान से किया जा रहा खुला खिलवाड़ है। पिछले 15 वर्षों से राज्य में इंजेक्शन और टीकों की गुणवत्ता जांच लगभग बंद है। यानी जिस दवा पर मरीज की ज़िंदगी निर्भर करती है, वह सुरक्षित है या नहीं, इसकी पुष्टि करने की व्यवस्था ही खत्म कर दी गई है।
सरकार दूसरे राज्यों पर निर्भर
राज्य की सरकारी प्रयोगशालाओं में इंजेक्टेबल दवाओं की जांच की सुविधा मौजूद नहीं है। सरकार दूसरे राज्यों पर निर्भर है, जहां सैंपल भेजने के बाद रिपोर्ट आने में दो से तीन महीने लग जाते हैं। इस दौरान वही संदिग्ध दवाएं अस्पतालों में इस्तेमाल होती रहती हैं। बच्चों को टीके लगाए जाते हैं, गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को इंजेक्शन दिए जाते हैं, बिना यह जाने कि दवा असरदार है या नुकसानदेह।जब कभी सैंपल फेल होने की पुष्टि होती है, तब तक दवा सैकड़ों लोगों के शरीर में जा चुकी होती है। न कोई जवाबदेही तय होती है, न कोई मंत्री या अधिकारी जिम्मेदारी लेता है। यह लापरवाही नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित अपराध है।
न आधुनिक लैब बनीं और न जांच की सुविधा शुरू हुई
सबसे गंभीर सवाल यह है कि स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करने के दावे किए जाते हैं, फिर भी 15 साल बाद न आधुनिक लैब बनीं और न जाँच की सुविधा शुरू हुई। अगर व्यवस्था नहीं बनी, तो पैसा आखिर गया कहाँ?बीजेपी सरकार बड़े-बड़े अस्पतालों के उद्घाटन और स्वास्थ्य क्रांति के दावे तो करती है, लेकिन उन अस्पतालों में इस्तेमाल हो रही दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने से बचती है। क्योंकि जांच होगी तो नकली दवाओं, मेडिकल माफिया और सत्ता के रिश्ते उजागर होंगे।इंजेक्शन और टीकों की नियमित जांच न होना गरीब, किसान, महिला और बच्चों की जान को खतरे में डालना है। सरकार की यह चुप्पी साफ बताती है कि उसके लिए सत्ता अहम है, जनता की जान नहीं।
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