हिंदी सिनेमा में होली कभी भी केवल रंगों का उत्सव नहीं रही। वह कथा-विन्यास का एक ऐसा उपकरण थी जिसमें प्रेम, संघर्ष, सामाजिक तनाव, नैतिक उलझनें और मानवीय रिश्तों की परतें एक साथ खुलती थीं। पाँचवे दशक से लेकर नब्बे के दशक तक फिल्मों में होली का दृश्य कथानक का हिस्सा नहीं, उसकी आत्मा का हिस्सा माना जाता था। आज जब यह रंग लगभग पूरी तरह फिल्मी स्क्रीन से गायब हो गया है, तो यह बदलाव सिर्फ तकनीक, बाजार या सौंदर्यशास्त्र का नहीं, बल्कि सामूहिक संवेदनाओं के क्षरण का संकेत है।
उत्सव और त्रासदी का साझा फ्रेम
फिल्म मदर इंडिया में नर्गिस की ‘राधा’ जिस सामाजिक संघर्ष से गुजरती है, उसके समानांतर होली का दृश्य जीवन की दो विपरीत धाराओं—खुशी और दुःख—को एक साथ रखता है। रंगों की चकाचौंध ग्रामीण यथार्थ की कठोरता को और तीव्र बना देती है। यह वही सिनेमाई समझ थी जो जानती थी कि भारतीय जीवन में उत्सव और त्रासदी एक-दूसरे की छाया हैं। इसी वजह से उस दौर की फिल्मों में होली केवल रंगों की बौछार नहीं, बल्कि चरित्रों के भीतर के संघर्ष को उभारने वाली दृश्य-भाषा थी।
गीतों का अर्थ और कहानी की दिशा
सत्तर और अस्सी के दशक में होली गीत कहानी के मोड़ का निर्णायक क्षण बन जाते थे। फिल्म कटी पतंग का “आज न छोड़ेंगे” प्रेम और सामाजिक दूरी के बीच का तनाव सामने लाता है। शोले का “होली के दिन दिल खिल जाते हैं” ग्रामीण समुदाय, दोस्ती और भरोसे की ऐसी झलक पेश करता है जो आज की स्क्रीन पर दुर्लभ है। वहीं सिलसिला का “रंग बरसे” हिंदी सिनेमा का सबसे जटिल होली गीत है—रंग यहॉं बाहरी नहीं, बल्कि अंतरात्मा में छुपे प्रेम, अपराधबोध और नैतिक संघर्ष के प्रतीक हैं। यह वह समय था जब एक गीत कथा की दिशा बदल सकता था, क्योंकि होली कहानी कहने की भाषा थी।
सामाजिक रिश्तों, संघर्षों और विडंबनाओं की होली
मुख्यधारा सिनेमा में होली पारिवारिक और सामाजिक ताने-बाने को उजागर करने का औजार भी रही। फिल्म बागबान में रंगों के बीच माता-पिता की उपेक्षा यह बताती है कि आधुनिक परिवार में उत्सव तो हैं, पर भावना नहीं। डर में रंगों की भीड़ भय और जुनून को और खतरनाक बना देती है। वहीं मशाल में सामाजिक अन्याय की पृष्ठभूमि में होली का होना एक विडंबना पैदा करता है—बाहर रंग हैं, भीतर अँधेरा। इन फिल्मों ने साबित किया कि होली केवल सजावट नहीं, बल्कि मानवीय मनोदशा को पढ़ने का माध्यम है।
आज की फिल्मों से होली क्यों गायब है?
सबसे बड़ा कारण है सिनेमा का अत्यधिक व्यक्तिवादी हो जाना। आधुनिक कथानकों में “मैं” केंद्र में है, जबकि होली “हम” का त्योहार है। दूसरा कारण है ओटीटी-प्रधान वैश्विक एस्थेटिक, जहां त्योहारों को अक्सर ‘स्थानीयता’ मानकर हटाया जाता है। तीसरा कारण है संगीत की बदलती आत्मा—लोकधुन, ठुमरी और ब्रज भाषा की जगह इलेक्ट्रॉनिक पार्टी-ट्रैक्स ने ले ली है। इसके अलावा रंगों के साथ शूटिंग की कठिनाइयाँ और सामाजिक सतर्कता ने भी फिल्मकारों को पीछे धकेला है। यह सब मिलकर इस बात की पुष्टि करता है कि होली इसलिए गायब नहीं हुई क्योंकि त्योहार बदला है, बल्कि इसलिए क्योंकि सिनेमा अपने समाज की धड़कन से दूर चला गया है।
रंगों की वापसी का रास्ता: सिनेमा का समाज से पुनः संवाद
बॉलीवुड की सामूहिक परंपराएँ—आर.के. स्टूडियो की होली, अमिताभ बच्चन के जलसा की होली, शाहरुख खान के मन्नत की होली—इंडस्ट्री की सांस्कृतिक आत्मा हुआ करती थीं। जब यह आत्मा बिखरी, तो होली भी स्क्रीन से गायब हो गई। इसकी वापसी तभी संभव है जब सिनेमा फिर से समाज की नब्ज पकड़े, लोक और सामूहिकता को पुनः कथा में शामिल करे और उत्सवों को केवल दृश्य-सज्जा नहीं, बल्कि कहानी कहने की भाषा बनाए। जब यह संवाद लौटेगा, तभी रंग लौटेंगे—और उनके साथ वह सिनेमा भी जो कभी हमारा अपना हुआ करता था।
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